अभिव्यक्ति के प्रधान संपादक रामचंद्र शुक्ल की आत्मकथाः दास्ताने जिंदगी

“दास्ताने-ज़िंदगी” के इस भाग में आगे अपनी 25 साल पुरानी डायरी के कुछ प्रासंगिक अंश दिए गए हैं, जिन्हें लखनऊ से जम्मू तवी तक की यात्रा तथा वापसी यात्रा के दौरान लिखा गया था। यद्यपि वर्तमान समय में पंजाब राज्य की जनता की जीवन-स्थितियों में कोई बड़ा बदलाव तो नहीं आया है, पर खेती के काम के निरंतर घाटे का सौदा होते जाने के कारण खेती से जुड़ी पंजाब की जनता की बदहाली बढ़ी है और किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला बढ़ता चला गया है।
उत्तर प्रदेश जैसे आबादी के लिहाज़ से देश के सबसे बड़े राज्य में गाँवों के किसान परिवारों की पशुधन की खरीद-फरोख्त पर कानूनी रोक लगाने के कारण पूरे प्रदेश में अनुत्पादक छुट्टा व आवारा पशुओं की संख्या इतनी ज़्यादा हो गई है कि किसानों के लिए इनसे अपनी फसलों की रक्षा करना अत्यंत मुश्किल काम हो गया है। आवारा पशुओं, नीलगायों, जंगली सुअरों तथा बंदरों से अपनी फसलों की सुरक्षा के लिए किसानों को रात-दिन अपनी फसलों की रखवाली करनी पड़ रही है। नीलगायों ने दलहनी फसलों का सर्वनाश कर दिया है। किसानों द्वारा खेतों के चारों ओर बाँस-बल्लियों व कंटीले तारों से की जाने वाली बाड़बंदी के बावजूद भी किसान अपनी दलहनी फसलों की रक्षा करने में असफल सिद्ध हो रहे हैं। भारत में दलहन का उत्पादन निरंतर घटते जाने के कारण देश को दलहन का आयात मलावी, तंज़ानिया व मोज़ाम्बीक जैसे अफ्रीकी देशों से बड़ी मात्रा में करना पड़ रहा है।
भारत के सबसे अमीर कॉरपोरेट व पूँजीपति अडानी ने उपरोक्त अफ्रीकी देशों की लाखों एकड़ ज़मीन कॉन्ट्रैक्ट पर लेकर उसमें अरहर (तुअर) की खेती पिछले कई वर्षों से शुरू की है। इस अरहर की मिलिंग, प्रोसेसिंग तथा पैकिंग कराकर वह देश-भर में बेचकर अकूत मुनाफा कमा रहा है। अब तो उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में किसानों को अपने धान व गेहूँ की फसलों की भी रखवाली करनी पड़ रही है। अब देखना यह है कि भारत के किसान आगामी कितने वर्षों तक अपनी ज़मीनों को देश के कॉरपोरेट घरानों के हाथों में जाने से बचा पाते हैं। आगे अपनी 25 साल पुरानी डायरी के कुछ अंश प्रस्तुत हैं।
दि०-12-09-1997 :
गोरखपुर से जम्मू तवी जा रही अमरनाथ एक्सप्रेस होशियारपुर (पंजाब) ज़िले के किसी छोटे से स्टेशन पर खड़ी है। कल रात 08 बजे इंजन के बाद तीसरे डिब्बे (रिज़र्व) में हम सवार हुए हैं। साथ के लोगों में अपने पुराने व प्रिय मित्र डॉक्टर शिव सिंह कनौजिया जी और नए मित्र एवं सहकर्मी विभाकर द्विवेदी जी तथा बाकी 15-20 लोग भी कानपुर के ही हैं। घर से निकलते समय रेलवे की समय-सारणी लाना भूल गया, सो स्थान व दूरी के ज्ञान में परेशानी हो रही है।
भारत का समृद्ध सूबा पंजाब। दूर-दूर तक लहलहाती हरी-पीली फसलें। धीरे-धीरे शहर व क़स्बों का रूप लेते जा रहे हैं पंजाब के गाँव। खेतों और सिवानों के बीच स्थित स्कूलों-कॉलेजों के आसपास कपड़े उतार कबड्डी व अन्य खेल खेलते बच्चे। डिब्बे के भीतर देवी-जी की भक्ति के रंग में सराबोर वैष्णो देवी के दर्शनार्थ जा रहे यात्री। अधिकांश लोग परिवारों के साथ हैं।
पंजाब में भौतिक समृद्धि के बावजूद लोगों के चेहरों पर वह ज़िंदादिली, वह खुशी नहीं दिखती, जिसके लिए पंजाब जाना जाता है। लोग स्वस्थ हैं, पर चेहरों पर उदासी और बेगानापन छिपाए नहीं छिपता। 15 साल तक उग्रवाद की आग में जलने-झुलसने के बाद पिछले एक-दो वर्षों में पंजाब में शांति आई है। पंजाब के शहरों और गाँवों में चारों ओर बिहार और उत्तर प्रदेश के दुबले-साँवले चेहरों वाले लोग दिखते हैं। अब पंजाब व हरियाणा के बड़े व मँझोले किसानों की खेती उत्तर प्रदेश व बिहार के मज़दूरों के बलबूते पर होती है। खेतों व गाँवों में झुग्गी-झोपड़ी डालकर गुज़र-बसर करने वाले इन मेहनतकश लोगों को आसानी से पहचाना जा सकता है।
बड़े रेलवे स्टेशनों पर गंदगी और ठगी से उकताए, जल्दबाज़ और काम की चिंता में डूबे लोग। 1980 में इंटर की परीक्षा देने के बाद मई-जून में अमृतसर गया था, तब हिंदू-सिख जनता के मध्य किसी भी तरह का संदेह व तनाव नहीं था। लेकिन सन 1984 के ऑपरेशन ब्लू स्टार व इंदिरा गांधी के हत्याकांड के बाद से पंजाब का सामाजिक सौमनस्य लगातार खराब होता चला गया है। सिख मेहनती, मिलनसार व अत्यंत सामंजस्यशील होते हैं। भारत-भर में छोटे-बड़े रोज़गार-धंधों में यह जाति लगी है और सफल रही है। साथ ही स्थानीय समाज में ये घुल-मिल भी गए हैं। इनकी तुलना में इतने दिनों तक साथ-साथ रहने के बावजूद हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे से अपेक्षाकृत दूर हैं। सिखों में झूठ-मूठ का दिखावा नहीं होता। ज़रूरत पड़ने पर ये मोटा-महीन कोई भी काम करने में संकोच नहीं करते।
परंतु स्वतंत्रता के बाद हुए मोहभंग एवं बढ़ती बेरोज़गारी के साथ सत्ताधीशों द्वारा पंजाब में खेले गए राजनीतिक खेल—अकाली दल की शक्ति को तोड़ने, पंजाब की जनता की वर्गीय एकता को खत्म करने तथा पश्चिम बंगाल से शुरू हुए नक्सलवादी आंदोलन के प्रभाव को पंजाब राज्य से खत्म करने के लिए साम्प्रदायिक व नस्लीय भेदभाव, उग्रवाद तथा भिंडरावाले जैसे लोगों को बढ़ावा देना; फिर अमृतसर में स्वर्ण मंदिर को घेरवाकर उसे क्षति पहुँचाना—इसी क्रम में इंदिरा गांधी की हत्या तथा तत्पश्चात देश-भर में सिखों के विरुद्ध हुई हिंसा ने शांत व संयमी सिखों को भी झकझोर कर रख दिया। यद्यपि संयमशील व सामंजस्यशील सिख पुनः राष्ट्र की मुख्यधारा में आकर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में व्यस्त हो गए हैं, पर अपमान का वह पुराना घाव अभी तक भरा नहीं है और नासूर की शक्ल में कभी-कभी उभर आता है।
अपराह्न 02 बजे के बाद :
पठानकोट आने वाला है। सिंगल ट्रैक होने के कारण ट्रेन रुक-रुक कर चल रही है। बीच-बीच में आम-नींबू के बाग़ और बबूल के पुराने पेड़। बबूल सर्वव्यापी है। यूकेलिप्टस के पेड़ भी आसपास दिख रहे हैं। क्रेशर मशीनों वाला क़स्बा। पके व कच्चे भुट्टों वाले मक्का के खेत। बगल में रेल लाइन के समानांतर पंजाब की कोई सूखी बड़ी नदी, जिसके बीच पड़े बड़े पत्थरों को ट्रकों पर लादा जा रहा है। ट्रकों की कतारें व मालगाड़ी के खाली डिब्बे। यात्री लंबी यात्रा से थक चुके हैं और जम्मू शीघ्र पहुँच जाने की बेताबी उनके चेहरों से झलक रही है। धूप नहीं है, पर उमस मज़ेदार है। सारे यात्री बाहर की दृश्यावलियाँ देखने में तल्लीन हैं। पंजाब में कहीं भी ऊसर या बंजर भूमि के दर्शन नहीं होते।
दि०-13-09-1997 :
देर शाम 08 से 09 बजे के बीच ट्रेन पठानकोट व जालंधर के बीच दौड़ रही है। बिना सीट आरक्षित कराए ही जम्मू से दिल्ली जाने वाली “जम्मू मेल” के आरक्षित डिब्बे में बैठ गया था। पठानकोट में कंडक्टर के आने पर 54/- रुपये देकर सीट रिज़र्व कराई। कल अपराह्न 03 बजे के बाद अमरनाथ एक्सप्रेस जम्मू पहुँची थी, जहाँ से बस लेकर रात 09 बजे तक सभी लोग कटरा पहुँच गए थे। रात 10:30 बजे वैष्णो देवी मंदिर जाने के लिए सभी लोग चल पड़े थे। कुछ दूर तक सभी लोग साथ-साथ रहे, फिर तीन-चार समूहों में बँटकर चलने लगे। मैं डॉक्टर शिव सिंह कनौजिया जी के साथ आगे निकलते हुए सुबह 04:30 बजे के आसपास देवी मंदिर के प्रांगण में पहुँच गया था। देवी के दर्शन हेतु हमारी प्रवेश-पर्चियाँ पीछे आ रहे साथियों के पास थीं। सारी रात चढ़ने-उतरने से शरीर पूरी तरह थककर चूर हो गया था।
मैंने डॉक्टर कनौजिया से मंदिर में प्रवेश कर देवी के दर्शन करने का प्रस्ताव रखा। उस समय मंदिर में प्रवेश चल रहा था और भीड़ भी नहीं थी। डॉक्टर साहब ने पीछे आ रहे साथियों की प्रतीक्षा करने तथा प्रवेश-पर्ची आने की बात कही। उस गुफा-रूपी मंदिर के प्रांगण में सर्दी से काँपता शरीर तथा अनिश्चय व बोरियत-भरी प्रतीक्षा—मेरा धैर्य जवाब देने लगा। मैंने डॉक्टर कनौजिया जी से देवी-जी को वहीं से प्रणाम कर दान विभाग में दान व प्रसाद चढ़ाकर वापस चलने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा कि वे बिना देवी माँ का दर्शन किए वापस नहीं लौटेंगे। इस पर मैंने अपना चढ़ावा तथा द्रव्य आदि उनके हवाले किया और अत्यंत खेद के साथ उन्हें व देवी-जी को नमस्कार कर वापस लौट पड़ा। अब पैदल वापसी की शरीर में शक्ति नहीं बची थी, सो तुरंत एक घोड़ा 128/- रुपये में लिया और सुबह 06:00 बजे गुफा-प्रांगण से चलकर 09 बजे कटरा आ गया। वापसी यात्रा में 15-16 साल का सुंदर व मासूम लड़का घोड़े की लगाम थामे चलता-दौड़ता रहा।
कटरा वापस आकर बाणगंगा में स्नान किया। वहाँ के एक मंदिर में दर्शन कर प्रसाद व सेब आदि लेकर जम्मू आ रही बस में बैठ गया। बस में बेतरह नींद आ रही थी। दोपहर 12 बजे के बाद जम्मू पहुँच गया। जम्मू में कुछ जलपान व भोजन किया तथा अंबाला जाने वाली किसी ट्रेन में रिज़र्वेशन के लिए दौड़-भाग करने लगा, पर कामयाबी नहीं मिली। अंबाला जाने वाले एक सज्जन से मुलाक़ात हुई; उन्हें अंबाला तक का टिकट ख़रीदने का पैसा देकर थक-चूर हालत में एक बेंच पर बैठ गया। काफ़ी देर तक ट्रेन के साधारण श्रेणी के डिब्बे में जगह पाने के लिए दौड़-भाग करता रहा, पर जगह नहीं मिली।
आख़िरकार ट्रेन के आख़िरी रिज़र्व कोच में चढ़कर बैठ गया। कुछ देर बाद ऊपर की एक सीट खाली दिखी तो उसी पर लेटकर सो गया और दो घंटे से ज़्यादा देर तक सोता रहा। कंडक्टर आया तो उसे पैसे देकर वही सीट अंबाला तक के लिए रिज़र्व करा ली। पठानकोट में उतरकर पानी की एक बोतल ली और चाय पी। अब जालंधर आने वाला है। जालंधर में ट्रेन के इस डिब्बे में कई पैसेंजर घुस आते हैं। पुलिस वाला उन्हें धमकाकर अगले स्टेशन पर इस डिब्बे से उतरने को कह रहा है। नीचे की सीट पर कई महिला यात्रियों वाला परिवार भी अंबाला जा रहा है। पंजाबी में चल रही उनकी बातचीत समझ में नहीं आ रही है।
इस यात्रा के बाद से 25 साल बीत गए हैं, लेकिन फिर कभी वैष्णो देवी की यात्रा पर नहीं गया। इसके बाद अंबाला शहर तक कई बार जाना हुआ, लेकिन अंबाला से आगे पंजाब के किसी शहर में फिर कभी जाना नहीं हुआ। आज उस यात्रा के बारे में सोचता हूँ तो यही पाता हूँ कि देश के हिंदू समुदाय के लोगों द्वारा इस गुफा की धार्मिक यात्रा से जम्मू-कश्मीर के बहुत-से बेरोज़गार युवाओं को रोज़गार मिला हुआ है। लेकिन यह यात्रा मुझे धार्मिक कम और देश के लोअर-मिडिल-क्लास परिवारों के लिए पिकनिक व मनोरंजन का ज़रिया ज़्यादा लगती है। अपने सहकर्मी रहे एक सज्जन अपने माता-पिता को देवी-दर्शन हेतु वैष्णो देवी गुफा ले जा रहे थे। रास्ते में अर्धकुमारी में उनके पिताजी को ऑक्सीजन की कमी के कारण साँस लेने में दिक्कत होने लगी। जब तक वे इधर-उधर डॉक्टर की तलाश करते, तब तक पिताजी का हार्ट-फेल हो गया और उनकी मृत्यु हो गई। आख़िरकार उन्होंने देवी-दर्शन की योजना रद्द कर एम्बुलेंस बुक कर पिता का मृत शरीर व पूरे परिवार के साथ अर्धकुमारी से लखनऊ वापस लौटना पड़ा।