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कहानी

एक टुकरा याइद ले - विक्की मिंज

संपादकीय टीम 3 फ़रवरी 2026 को 03:51 pm बजे
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हुत पहले की बात है। जंगल, पहाड़ और खेतों की गोद में सिमटा हुआ एक छोटा-सा गाँव था। दूर से देखने पर वह गाँव साधारण लगता था, लेकिन उसकी मिट्टी में पुरखों की साँसें बसती थीं। जैसे हर कण में बीते समय की धड़कन छुपी हो। साल और महुआ के पेड़ उस गाँव के मौन पहरेदार थे—बरसात में वे धरती को चादर की तरह ढँक लेते और तपती गर्मी में अपनी छाया से लोगों को राहत देते।

उसी गाँव में तीन बहनों का मायका था। उनका घर मिट्टी का था, मगर उसमें सुकून रहता था। उनके माता-पिता मेहनतकश किसान थे। सूरज निकलने से पहले पिता कुदाल उठाकर खेत की राह पकड़ लेते और माँ घर, जंगल और खेत—तीनों को अपने हाथों से थामे रहती। उनका जीवन कठिन था, लेकिन खाली नहीं; थकान थी, पर शिकायत नहीं।

तीनों बेटियाँ बचपन से ही काम और जीवन के बीच पली थीं। कोई खेत में बीज डालते हुए हँसती थी, कोई जंगल से साग चुनते समय गीत गुनगुनाती थी, तो कोई माँ के साथ चूल्हे पर रोटियाँ सेंकते हुए आग से बातें करती थी। उन दिनों बेटियाँ बोझ नहीं समझी जाती थीं। वे घर की नींव थीं—मिट्टी की तरह, जो चुपचाप सब कुछ थामे रहती है।

समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। वह नदी की तरह बहता रहा और उसी बहाव में तीनों बहनें भी धीरे-धीरे बचपन की देहरी पार कर गईं। खिलखिलाती लड़कियाँ अब जिम्मेदार युवतियाँ बन चुकी थीं। गाँव की पगडंडियों ने उन्हें बड़ा होते देखा था और खेतों की मेड़ों ने उनकी परछाइयों को लंबा होते। फिर वही हुआ, जो हर गाँव में होता है—रिश्तों की बातें चलीं, बड़ों ने सलाह की और परंपरा ने रास्ता तय कर दिया।

तीनों बहनों की शादी अलग-अलग दिशाओं में कर दी गई। बड़ी बहन पूरब की ओर चली गई, जहाँ सूरज पहले उगता है। मँझली बहन पश्चिम की ओर गई, जहाँ दिन ढलते-ढलते आसमान सुर्ख हो जाता है। और छोटी बहन दक्षिण दिशा में ब्याही गई, पहाड़ों के उस पार, जहाँ हवा कुछ और तरह से बोलती थी। तीनों के नए घर बस गए, नए आँगन मिले, नए रिश्ते जुड़ गए। लेकिन मन के किसी कोने में मायके की वह मिट्टी अब भी धड़कती रही। जैसे नई साड़ी के भीतर पुराना आँचल छुपा हो।

शादी के बाद भी मायके की राह उनके लिए अनजानी नहीं हुई। फसल कटने का समय हो, करम या सरहुल का पर्व हो, या फिर माता-पिता की तबीयत का कोई संदेश आए—उनके कदम अपने-आप उसी दिशा में मुड़ जाते। मायके पहुँचते ही माँ का चेहरा खिल उठता। वह बेटियों को ऐसे देखती, जैसे सूखी धरती को अचानक बारिश मिल गई हो। पिता ज़्यादा कुछ नहीं कहते, बस आँगन की खाट पर बैठकर उन्हें देखते रहते। उनकी आँखों में शब्द नहीं होते, लेकिन वह चुप्पी भी अपनापन कह जाती।

वे दिन किसी बहते पानी की तरह निकलते गए—बिना शोर किए, बिना थामे। बेटियाँ आतीं, कुछ दिन रुकतीं, फिर अपने-अपने घर लौट जातीं। मायके का घर तब तक साँस लेता रहता, जब तक उसमें माँ की हँसी और पिता की उपस्थिति थी।लेकिन एक दिन वह साँस जैसे रुक-सी गई। माँ बीमार पड़ी। पहले हल्का-सा ज्वर, फिर थकान, और फिर धीरे-धीरे शरीर ने साथ छोड़ना शुरू कर दिया। जंगल की जड़ी-बूटियाँ भी काम न आईं। एक सुबह माँ की आँखें खुलीं ही नहीं। तीनों बहनें रोती हुई मायके पहुँचीं। घर में वही दीवारें थीं, वही आँगन था, लेकिन सब कुछ सूना लग रहा था। चूल्हा ठंडा पड़ा था, जैसे आग भी शोक में बुझ गई हो। माँ के जाने के बाद पिता और अधिक चुप हो गए। खेत जाते, काम करते, लौट आते। कुछ साल ऐसे ही बीते। फिर एक दिन पिता भी खेत से लौटते हुए गिर पड़े। गाँव ने एक बुज़ुर्ग खो दिया और बहनों ने अपनी आख़िरी छाया।अब मायके में केवल दीवारें रह गईं—और उनमें अटकी हुई यादें।

माता-पिता के जाने के बाद भी तीनों बहनें मायके आती रहीं। वह जगह उन्हें खींचती थी। शुरू-शुरू में खानदान के लोग उन्हें रोकते-टोकते नहीं थे। खाना देते, बैठने को कहते, हालचाल पूछते। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, हवा का रुख बदलने लगा।अब उनके आने से पहले ही घर में खुसर-पुसर शुरू हो जाती।

“फिर आ गईं?”

“अब तो इनका घर और है।”

“यहाँ बार-बार आने की क्या ज़रूरत है?”

चेहरे बदलने लगे। बातों में अपनापन कम और हिसाब-किताब ज़्यादा हो गया। पहले जहाँ बेटियों के आने से घर भर जाता था, अब वहाँ एक अनकहा बोझ उतर आता। तीनों बहनें सब समझती थीं, लेकिन चुप रहती थीं। क्योंकि मायका केवल एक जगह नहीं होता—वह स्मृति होती है, जिसे आदमी आख़िरी साँस तक छोड़ नहीं पाता।

“बार-बार क्यों आती हैं?”

“अब इनका घर तो कहीं और है।”

“इनके आने से खर्च बढ़ता है।”

पहले ये बातें कानों तक ही पहुँचती थीं, दिल तक नहीं उतरती थीं। जैसे हवा में उड़ते सूखे पत्ते—दिखते तो थे, लेकिन छूते नहीं थे। मगर एक दिन किसी ने वह बात कह दी, जो अब तक अधूरी फुसफुसाहटों में छुपी थी—

“अब यहाँ मत आया करो।”

यह वाक्य किसी पत्थर की तरह तीनों बहनों के सीने पर आ गिरा। मायका, जिसे वे अपनी जड़ों की तरह थामे हुए थीं, अचानक उनके लिए पराया कर दिया गया। जिस आँगन में उनके बचपन की हँसी बिखरी थी, वही आँगन अब उन्हें पहचानने से इंकार कर रहा था। वे उस दिन कुछ नहीं बोलीं। न रोईं, न उलाहना दिया। बस चुपचाप अपने-अपने घर लौट गईं। लेकिन वह चुप्पी हल्की नहीं थी। वह ऐसी थी, जैसे मन के भीतर कोई भारी पत्थर रख दिया गया हो—जो न हटे, न टूटे, बस हर साँस के साथ बोझ बढ़ाता जाए।

रात को छोटी बहन देर तक सो नहीं पाई। छत की कड़ियाँ गिनते-गिनते उसकी आँखें भर आतीं। वही सवाल बार-बार उसके मन में उठता रहा, जैसे सूखे खेत में उगी ज़िद्दी घास—

“क्या सच में हमारा अब वहाँ कुछ नहीं बचा?”

कुछ दिनों बाद तीनों बहनें फिर मिलीं। इस बार मायके में नहीं, बल्कि बीच के रास्ते पर—जहाँ न कोई दीवार थी, न कोई रोक। वहीं छोटी बहन ने पहली बार वह बात कही, जिसे बाकी दोनों भी मन ही मन ढो रही थीं। उसकी आवाज़ काँप रही थी, लेकिन शब्द साफ़ थे—“माँ-बाबा की ज़मीन थी। हम भी उनकी ही संतान हैं। क्या हमारा उस पर कोई हक़ नहीं?”

यह सवाल केवल ज़मीन का नहीं था। यह उस रिश्ते का सवाल था, जिसे समाज ने धीरे-धीरे ढीला कर दिया था। तीनों बहनें एक साथ खानदान के पास गईं। न सिर झुकाकर, न आँचल फैलाकर। उन्होंने विनती की, गिड़गिड़ाईं नहीं—बस उतना ही माँगा, जितना उनका होना चाहिए था। वे बोलीं कम, उनकी आँखें ज़्यादा बोल रही थीं। आँखों में स्मृतियाँ थीं—माँ के हाथों की रोटियाँ, पिता के साथ खेत की मेड़ पर बिताई गई दोपहरें। लेकिन उनके सामने जो खड़ा था, वह संवेदना नहीं थी।

“औरत को ज़मीन?”

“यह कभी नहीं हुआ।”

“यह हमारे रीति-रिवाज़ के खिलाफ़ है।”

शब्द पत्थर बनकर बरसे। कोई उनकी बात सुनना नहीं चाहता था। परंपरा की आड़ में उन्हें बाहर धकेला जा रहा था—ऐसे जैसे वे उसी मिट्टी की नहीं थीं, जिसमें उन्होंने बचपन गुज़ारा था। तीनों बहनें फिर खाली हाथ लौट आईं। उनके पैरों में चलने की ताक़त थी, लेकिन मन थक चुका था। उस दिन उन्हें पहली बार यह एहसास हुआ कि उन्होंने सिर्फ़ ज़मीन नहीं खोई—उन्होंने अपनी पहचान भी खो दी है। क्योंकि जब इंसान से उसका हक़ छीना जाता है, तो उससे पहले उसका नाम, उसकी जगह और उसकी आवाज़ छीनी जाती है। और इसी चुप्पी से आगे की कहानी जन्म लेने वाली थी— एक संघर्ष की, एक याद की, और उस मिट्टी की, जो अभी उन्हें पूरी तरह छोड़ने को तैयार नहीं थी।

न्याय की एक छोटी-सी उम्मीद लेकर तीनों बहनें शहर गईं। वह शहर उनके लिए नया था—ऊँची इमारतें, भीड़ भरी सड़कें और ऐसी भाषा, जिसमें उनकी पीड़ा के लिए कोई शब्द नहीं थे। कोर्ट-कचहरी के लंबे गलियारों में वे कई बार गईं। कभी किसी काग़ज़ की कमी बताई जाती, कभी नई तारीख़ दे दी जाती। हर बार वे कुछ उम्मीद समेटकर जातीं और उससे ज़्यादा थकान लेकर लौटतीं।

काग़ज़ बनते रहे, दस्तख़त होते रहे, तारीखें बदलती रहीं। लेकिन न्याय कहीं दिखाई नहीं देता था। न उनके पास इतना पैसा था कि वे इस लड़ाई को लंबा खींच सकें, न इतनी समझ कि कानून की भाषा को पूरी तरह पकड़ सकें। अदालत उनके लिए किसी भूलभुलैया जैसी हो गई थी—जिसमें रास्ते तो बहुत थे, लेकिन बाहर निकलने का कोई साफ़ रास्ता नहीं।

साल बीत गए। बहनों के बालों में चाँदी उतरने लगी, लेकिन फैसले की एक पंक्ति भी उनके नाम नहीं हुई। उन्हें धीरे-धीरे समझ में आने लगा कि यह लड़ाई उनकी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है, जो उनके जैसे लोगों को सुनने के लिए बनी ही नहीं थी।

एक दिन, थकी हुई आँखों और बुझी हुई उम्मीदों के बीच, मँझली बहन ने चुप्पी तोड़ी। उसकी आवाज़ में न गुस्सा था, न रोना—बस एक ठहरा हुआ सवाल था।“हम परदेस की अदालत में क्यों भटक रहे हैं? हमारी अपनी व्यवस्था है।” उस वाक्य ने जैसे तीनों बहनों को झकझोर दिया। उन्हें याद आया कि जिस मिट्टी ने उन्हें जन्म दिया, उसी मिट्टी की अपनी समझ भी है। उन्होंने तय किया कि अब वे अपनी परंपरा के पास लौटेंगी। तीनों बहनें उराँव समाज की स्वशासन सभा के पास पहुँचीं। पंचायत बैठी। खुले आँगन में बुज़ुर्ग इकट्ठा हुए। सफ़ेद बाल, झुर्रियों भरे चेहरे और आँखों में वर्षों का अनुभव। वहाँ कोई ऊँची आवाज़ नहीं थी, कोई जल्दी नहीं थी। बात धीरे-धीरे आगे बढ़ी—जैसे नदी अपना रास्ता खुद बनाती है। तीनों बहनों ने अपनी बात रखी। उन्होंने न सजाया, न बढ़ाया। जो था, वही कहा। सभा में बैठे लोगों ने उन्हें पूरा सुना—बिना काटे, बिना डाँटे। उस दिन बहनों को पहली बार लगा कि उनकी आवाज़ हवा में नहीं खो रही है। बहुत देर तक चर्चा होती रही। परंपरा, रीत, न्याय—सब पर बात हुई। अंत में पंचायत ने निर्णय सुनाया—

“पूरा हिस्सा नहीं दिया जा सकता, लेकिन इन बेटियों को उनके माता-पिता की याद के रूप में ज़मीन दी जाएगी।” वह ज़मीन बहुत बड़ी नहीं थी। न उससे कोई बड़ी खेती हो सकती थी, न कोई मुनाफ़ा। लेकिन उसमें वह चीज़ थी, जो शहर की अदालत नहीं दे पाई थी—सम्मान। तीनों बहनों की आँखों में पहली बार राहत के आँसू आए। वे आँसू हार के नहीं थे, बल्कि उस पहचान के थे, जो उन्हें वापस मिली थी। उस ज़मीन पर उन्होंने मिलकर एक छोटा-सा घर बनवाया। मिट्टी की दीवारें, खपरैल की छत और सामने एक खुला आँगन। उन्होंने उस घर का नाम अपने माता-पिता के नाम पर रखा—ताकि हर आने-जाने वाला जाने कि यह घर केवल ईंटों का नहीं, स्मृतियों का है। जब भी वे वहाँ आतीं, दीवारों को छूतीं, आँगन में बैठतीं। हवा बहती, पत्ते सरसराते, और उन्हें लगता—माँ अभी रसोई से निकलकर आवाज़ देगी, और पिता खाट पर बैठे-बैठे सब कुछ देख रहे होंगे, बिना कुछ बोले, वैसे ही जैसे वे हमेशा देखते थे।

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अब वे वहाँ कभी-कभी आती थीं। न कोई सवाल करता, न कोई रोकता। वह घर अब किसी से छीना हुआ नहीं था। वह उनकी स्मृति था, उनका हक़ था—और उससे भी बढ़कर, उनका सुकून था। गाँव के लोग आज भी इस कहानी को याद करते हैं। आग के किनारे बैठकर, या महुआ के पेड़ के नीचे सुस्ताते हुए, वे कहते हैं—तीन बहनें तीन दिशाओं में गईं, लेकिन अपनी जड़ों से कभी अलग नहीं हुईं।क्योंकि ज़मीन केवल खेत नहीं होती।वह याद होती है—जो पीढ़ियों तक साँस लेती है।वह सम्मान होती है—जो चुपचाप खड़ा रहता है।और वह पहचान होती है—जो इंसान को अपने होने का अर्थ बताती है।और इसी पहचान में तीनों बहनों की कहानी आज भी ज़िंदा है।

परिचय
विक्की मिंज ‘इंजोत’ समकालीन नागपुरी साहित्य के सक्रिय कवि, शोधार्थी एवं भाषाई-सांस्कृतिक विमर्श से जुड़े लेखक हैं। वर्तमान में वे रांची विश्वविद्यालय, रांची के नागपुरी भाषा विभाग के अंतर्गत पीएच.डी. शोधरत हैं। उन्होंने नागपुरी भाषा में स्नातक एवं स्नातकोत्तर की शिक्षा प्राप्त की है तथा वर्ष 2019 में UGC NET/JRF उत्तीर्ण किया है।
उनका शोध एवं लेखन-कार्य नागपुरी, असमिया तथा अन्य जनजातीय भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन, भाषिक संरचना, आदिवासी समाज, संस्कृति, लोकपरंपरा और समकालीन विमर्श पर केंद्रित है। वे नागपुरी, हिंदी, अंग्रेज़ी, कुड़ुख, मुंडारी एवं असमिया भाषाओं का कार्यात्मक ज्ञान रखते हैं।
विक्की मिंज ‘इंजोत’ की मौलिक काव्य-पुस्तक ‘मालती’ (नागपुरी कविता संग्रह) प्रकाशित हो चुकी है, जिसका लोकार्पण झारखंड के करम महोत्सव (2024) के अवसर पर हुआ। उनके लेख और कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, शोध-संकलनों एवं साहित्यिक मंचों पर प्रकाशित एवं पाठित होती रही हैं।
वे साहित्य को सामाजिक परिवर्तन, भाषाई अस्मिता और सांस्कृतिक संरक्षण के सशक्त माध्यम के रूप में देखते हैं तथा उनका लेखन आदिवासी विमर्श, स्त्री विमर्श और क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण-संवर्धन से गहराई से जुड़ा हुआ है।