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कविता

चुना मैंने प्रेम -अलका प्रकाश

संपादकीय टीम 11 जनवरी 2026 को 12:37 pm बजे
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चुना मैंने प्रेम
मैंने चुना तुम्हें भरोसे की तरह
एक विश्वास की शक्ल में आए तुम सामने
तर्क था प्यार का जिसमें शामिल था भरोसा
और विश्वास भी था गहरा

धोखे की आंख छुप नहीं पाती
जैसे नहीं छुपा रहता देर तक छल का आवरण
मैंने तुम्हारे आंसुओं में देखा उतरकर
घुले हुए थे मेरे काजल के रंग बहते हुए

सुनी थी दिल की आवाज़
जिसमें तुम गा उठे थे कोई उदास करनेवाला गीत
चुना मैंने उस धुन को
जिसमें हम भी थिरकने लगे थे

चेहरे बहुत से होते हैं मासूम और निर्दोष से लगते
चेहरा तुम्हारा मगर लगा ऐसा जैसे
सदियों से हो पहचान और देखने लगे हम खुद भी
उसमें अपनी छवि को साफ़ साफ़

नाम होता प्यार का मगर नहीं होता वह केवल प्यार ही
न हो भरोसा न विश्वास फिर हो कैसा वह प्यार
न हो जैसे हर अंधड़ से लड़ पाने का हौसला देते हाथ

चुना मैंने एक दिया नाम लिखा तुम्हारा
छोड़ दिया अपने हृदय नद में तैरने को
जल रहा जो निरन्तर प्रकाशमान हो

चुना मैंने इस तरह एक संकल्प को
प्रेम होता गया गया मेरे अस्तित्व में समाहित

हम हो उठे नया जैसे नव किसलय फूट पड़ा हो
दरख़्त के मध्य आषाढ़ के पहले पक्ष में यकायक.....

विस्थापन

प्रेम विस्थापन होता है अपने से
मन लेता है किसी और देश की नागरिकता
देह रहती कठोर कारावास में
हम सुधियों में जीने को मानने लगते नेमत
सच ! कितना प्रिय हो जाता यह निर्वासन
देह का मन से रहना दूर
मन का हो जाना किसी और देश का वासी...

प्रेम होते हुए

कभी कभी होता ऐसा भी
जब हो जाते हम उदास बहुत
सूना पड़ जाता हृदय
जैसे बिन बारिश वीरान हो जाती धरती
दिखता नहीं एक भी बिरवा लहलहाता
ताकते रहते अपलक किसी परिचित दिशा में
आ जाए पाहुन उगते सूर्य की तरह फैलते हुए धीरे धीरे
वनस्पतियां खिल उठें लहलहा
रात भीगी पलकों के साथ हो जाय विदा
खिले हमारा हृदय पुष्प भी अपने पूरे यौवन में
हमारे भीतर फूट पड़े झरना अचानक

नहीं होता सदा ऐसा
ऐसा नहीं होता अक्सर
सोचते जैसा हम
तब होने न होने के बीच उलझे हम
अपनी याद की खोलते हैं गठरी
प्रिय की सहलाते हैं सुधियाँ
और जी उठते हैं

जैसे किसी का होना होती स्मृति
उसी तरह अनुभूति ही होता प्रेम भी
याद करना समो लेना अपने में समय को
सहेजे प्रिय के अनगिन राग रंग
अनुभूत करना अपने में

सत्य यही बस एक
कभी कभी भूल जाते इसे हम
प्रेम दृश्य में नहीं है उस अछोर विस्तार में है
जिसे मात्र कर सकते अनुभूत
नहीं जान सकते उसके अलख रूप को

कभी कभी होते उदास
सोचते अक्सर प्रेम के बारे में
प्रेम होते हुए अपने न होने के एहसास के साथ......

सज़ा
दिन जो होते वेदना के
नहीं होते समाप्त
जैसे रातें नहीं ढलतीं
तृषा की आग में लिपटी हुईं
दुःख होता जो होता जाता अपार
प्रेम होता जो होता जाता पीर
कैसे कहे कोई मन की व्यथा
जब न रहे मन चला जाय
किसी दूर की यात्रा पर
मनुष्य होने की सज़ा
नहीं इतनी मामूली
कि पासंग भर भी न पा सके जगह
ढुलकते आंसुओं को सम्भाल पाने के लिए.....

इंतज़ार नहीं होता महज़ एक शब्द

इंतज़ार नहीं होता महज़ एक शब्द
उसकी पहुंच होती हमारी आत्मा तक
हम गिनते समय को उसकी माप में
जैसे पहर , दिन , सप्ताह और बरस
इस माप में बंटे रहते हम
थोड़ा थोड़ा जीते हुए
जीने को एक पूरा जीवन

जीवन यह जो होता इंतज़ार का
एक आग - सी जलती रहती भीतर
पकते उसमें हमारे सपने
दुनिया अच्छी से अच्छी लगती रोज़ रोज़
मौसम चाहे कोई हो
इंतज़ार में होती रहती भरपूर बारिश
हम भींग भींग जाते अक्सर
करते ख्याल और डूबते जाते
उन मीठी चाहतों में
जो सोचते हम अपना एकांत खोजकर अक्सर ही

इंतज़ार एक चिट्ठी की तरह
आता रहता है
जिसके अनलिखे मज़मून
हवा की तरह हल्के करते हमें

न हो इंतज़ार अगर
तो यह जीवन कितना नीरस
नाउम्मीद हो जाया करे
फिर हमारा जीना कितना अर्थहीन हो जाय

न करें हम इंतज़ार अगर
और न हो आसरा किसी का
जिसकी आंच में तपते हुए हम
रोज़ ही बदलते अपनी काया
रोज़ ही तनिक धवल होती जाती हमारी आत्मा बेदाग सफेद चादर सी

तो कैसे जी सकें इस निर्मम समय में
जहां सम्बन्ध होते जा रहे बोझ
और संवेदनाएं भूल चुकीं अपना स्वभाव
इंतज़ार दिखाता है रास्ता
अपने में लौटने का
हो सकने का होने की तरह
इंतज़ार जीवन की उम्मीद है
उम्मीद में है दुनिया
और जब तक इंतज़ार है
हम नाउम्मीद होने से बचे रह जाते हैं
जीने की बेपनाह इच्छाओं के साथ.....

जीवन-समय
तुम्हारी स्मृति एक प्रार्थना गृह है
जिसमें रहती है तुम्हारी ही आकृति
हम झुके रहते प्रार्थना में तब तब
जब जब आते हो स्मृति में बेतरह
घण्टियों की तरह बजती हैं मेरी धड़कनें
शंख की तरह आत्मा करती है उदघोष
आंखों में चमक उतरती है तुम्हारी
ठीक उसी तरह जैसे
देवता हमारी श्रद्धा लेकर
उतरता है अपनी आभा के साथ
तुम एकतान होते हो हमारे ध्यान से
मंत्र के अजपा जाप से आह्लादित होते हो
स्फूर्त करते हो हमारे रोम रोम
तब एक साथ असंख्य फूलों की सुगन्ध
समा जाती है हमारे भीतर
हम बनने लगते हैं कुछ अलग
और इस तरह अपने होने का भ्रम खोकर
हम हो जाते निर्विकार
यह जो स्मृति है तुम्हारी
जीवन - समय है हमारे प्रेम का
रहते हम जिसमें निरन्तर होम होते हुए....

अंधेरे के ख़िलाफ़

मैं नहीं हूं किसी दृश्य में
हर परिदृश्य से कर दी गई बाहर
प्रत्येक समूह से बहिष्कृत

अकेले कमरे का एकांत
जिसमें हवा बहुत कम
सांस नहीं ली जाती
दरवाजा बाहर से बंद

कमरे के बाहर भी बहुत शोर
इतना कोलाहल आपाधापी
जाने कैसी आवाज़ें
तेजी से गूंजते अट्टाहास
सामने होतीं व्यंग्य मिश्रित मुस्कुराहटें

जब धीरे से कुछ कहती हूं
तेज कड़कती हैं आवाज़ें
और गुम हो जाते मेरे शब्द
इसी तरह होती जाती अनसुनी रोज़ बरोज़ अक्सर मैं

बाहर के शोर से होती आक्रांत
लौटती जब घर
एक अनचाहा तूफान करता रहता पीछा आए दिन
ऐसे में घर और बाहर की
चक्की के दोनों पाटों पर
पिसी जाती बेतरह
हो जाती हताश और श्लथ

फिर उठने की करती कोशिश
जीने का एक बार
और करती प्रयत्न
ज़िन्दगी बेरहम है या बेरहम है संसार
जब तक समझती
बीते जाने कितने अनगिन साल

अब जबकि मैं हूँ दृढ़
भीतर से रीते घड़े की तरह
हृदय बजता जाता है अक्सर
बाहर को महसूस कर कितना

जी उठूं या कि अंदर के तूफान से लड़ूं कितना
दृश्य को बदलने का माद्दा है
रोने के लिए ही नहीं बनीं आँखें
संभालती खुद को
एक बार फिर करती हूँ कोशिश
उस अंधेरे के ख़िलाफ़
जो छाता जा रहा अस्तित्व पर
नहीं आ पाती रोशनी
जिसमें देख सकूं अपना अक्स भी

अलका प्रकाश
मऊ, उत्तर प्रदेश में जन्मीं, इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. और डी.फिल. अलका प्रकाश स्त्री विमर्शकार और आलोचक के रूप में पहचानी जाती हैं। अपनी दृष्टि, विचार और विमर्श की सर्वथा नई भंगिमा के कारण उनकी उपस्थिति एक ऐसी लेखिका की है जिसमें नयापन है और स्त्री विषयक समस्याओं तथा चिंताओं को उनके पूरे परिप्रेक्ष्य में देखने-परखने की वैज्ञानिक समझ है। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनके लेख इन्हीं कारणों से सबका ध्यान आकृष्ट करते हैं। तमिल तथा कन्नड़ में अनुदित होकर प्रकाशित उनके लेख इस बात के प्रमाण हैं। उनकी मौलिक आलोचना कृति - 'हाशिये के स्वर' की बड़ी चर्चा रही है जो स्त्री, दलित तथा आदिवासी जीवन और उनके संघर्ष को लेकर लिखी रचनाओं को विमर्श के केंद्र में लाती है और शक्ति केंद्रित मुख्य धारा के लेखन को उसके समानांतर रखकर उस पर जिरह करती है। उन्होंने अनेक पुस्तकों का लेखन और सम्पादन भी किया है जिनमें स्त्री जीवन के बुनियादी प्रश्नों को उनकी पूरी संरचना में समझने की ईमानदार पहल है। इन पुस्तकों में, नारी चेतना के आयाम, तन्द्रा टूटने तक, समय समाज और स्त्री, सत्ता प्रतिष्ठान और स्त्री अस्मिता तथा स्त्री-विमर्श : साहित्य और सैद्धान्तिकी शामिल हैं।
स्त्री विमर्श और आलोचना से सम्बन्धित विषयों पर निरन्तर लिखने-बोलने वाली अलका प्रकाश एक सुपरिचित कवयित्री भी हैं जिनकी कविताएँ प्रकाशित होकर चर्चा में आईं हैं। उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का प्रतिष्ठित रामचंद्र शुक्ल नामित आलोचना पुरस्कार 'हाशिये के स्वर' नामक पुस्तक पर मिल चुका है।
लंबे समय तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में अतिथि अध्यापक रहीं डॉ. अलका प्रकाश अब प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भय्या) विश्वविद्यालय, नैनी, प्रयागराज में हिंदी की सहायक प्रोफ़ेसर हैं।