डॉ. आर. डी. आनंद की 22 प्रेम कविताएँ

यह मेरी अर्थात डॉ. आर. डी. आनंद की 22 प्रेम कविताएँ आप सभी के अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं। जैसा यह सार्वभौम अनंत है, सार्वभौम के तत्व अनंत हैं और सार्वभौम की प्रक्रियाएं अनंत हैं; जैसे ही प्रेम के रूप भी अनंत हैं, प्रेम की अभिव्यक्तियां अनंत हैं, प्रेम के प्रकार अनंत हैं, प्रेम की गतिविधियां अनंत है और प्रेम के प्रभाव अनंत हैं। इन कविताओं में अभिव्यक्ति भाव से आप का इत्तेफाक भी हो सकता है और विरोध भी। यह आप के भौतिक परिस्थितियों से उत्पन्न अनुभव के चिंतन हैं। यह कविताएं आप के अपने भोगे यथार्थ लग सकते हैं और कवि की वैयक्तिकता भी। लगभग सभी पहलू यथार्थ के बहुत करीब होते हैं। कविता अन्तर्भूत घनी पीड़ा और प्रेम से उपजता है। कविता कवि का अनुभव भी होता है, सहानुभूति भी होती है, पुरानुभुति भी होती है और भोगा यथार्थ भी होता है। आप स्वतंत्र चिंतन के लिए स्वतंत्र हैं। -डॉ. आर डी आनंद
1)
कलेजे पर पत्थर
एक विवाहिता;
जब मनचाहे पुरुष से प्रेम कर बैठती है;
प्रेम ऐसा कि स्मृति से कभी मिटता नहीं;
तन, मन, धन सब सौंप देती है;
अपने भीतर कुछ भी शेष नहीं रखती है।
लोकलाज की परछाईं उसे नहीं डराती;
बदनामी के पत्थर वह हँसकर सह लेती है;
प्रेमी संग जीवन न मिल पाने का शोक;
कभी-कभी मृत्यु की बाँहों तक ले जाता है।
पर जब समाज प्रश्न बनकर सामने खड़ा होता है;
पूछता है—प्रेमी या पति-बच्चे?
तब वह कलेजे पर पत्थर रखती है;
और पति-बच्चों के साथ रहना चुन लेती है।
यह चयन कायरता नहीं;
यह त्याग की वह कठोर परिभाषा है;
जिसमें प्रेम भीतर जलता रहता है;
और एक अफसोस जीवन भर बना रहता है।
2)
भरोसे का वाक्य
उसने कहा,
मैं तुम्हें दुनिया की खुशियाँ देना चाहती हूँ;
मैं जीवन में कभी भी तुम्हें धोखा नहीं दूँगी;
मैं तुम्हें दुख नहीं दूँगी;
उसकी आवाज़ में वचन नहीं, भरोसा था;
जैसे प्रेम कोई शर्त नहीं, जिम्मेदारी हो;
जैसे साथ निभाना कोई एहसान नहीं, स्वभाव हो;
मैंने कुछ नहीं कहा;
क्योंकि जहाँ शब्द इतने सच्चे हों;
वहाँ मौन ही सबसे बड़ा विश्वास होता है;
बस, मैंने उसे कस कर गले लगा लिया।
प्रेम वहाँ घटित होता है;
जहाँ तलाश थक जाती है;
जहाँ विकल्पों की भीड़ चुप हो जाती है;
और मन कहता है—अब यही काफ़ी है;
न कोई बेहतर, न कोई और;
सिर्फ़ साथ निभाने की इच्छा शेष रहती है;
जहाँ बदलने की ज़िद नहीं रहती;
और स्वीकार अपने आप झुककर बैठ जाता है।
3)
तलाश और स्वीकार
कहते हैं,
स्त्रियाँ हमेशा बेहतर की तलाश करती रहती हैं;
पर कोई यह नहीं पूछता
कि वह बेहतर किसलिए चाहती हैं;
वह पुरुष नहीं, भरोसा खोजती है;
वह देह नहीं, भविष्य देखती है;
वह प्रेम में ठहराव चाहती है, विकल्प नहीं।
कहते हैं,
पुरुष उसी स्त्री को बेहतर बनाना चाहता है;
पर कोई यह नहीं टटोलता
कि उसका ‘बेहतर’ क्या है;
कभी वह सहारा बनता है, कभी शिल्पकार;
कभी वह प्रेम करता है, कभी गढ़ने लगता है;
और इसी अंतर में रिश्ते की रेखा काँप जाती है।
स्त्री तलाश करती है ताकि टूट न जाए;
पुरुष सुधार करता है ताकि छूट न जाए;
एक सुरक्षा खोजती है, दूसरा स्थायित्व;
दोनों प्रेम चाहते हैं, भाषा अलग-अलग है;
और प्रेम वहीं जन्म लेता है, जहाँ तलाश भी थक जाए;
और सुधार भी विनम्र होकर स्वीकार बन जाए।
4)
समय से परे प्रेम
वह कहती है—मैं प्रेमिका नहीं, बीवी हूँ;
प्रेम से आगे जीवन हूँ;
दो बदन, इक जान—यह उपमा नहीं, प्रतिज्ञा है;
वह कहती है—मैं शरीर नहीं, आत्मा चुनती हूँ;
परिवर्तन के सिद्धांत से वह जल उठती है,
कहती है—मैं कोई वस्तु नहीं जो आधार बदले और ढह जाऊँ;
मैं हर परिस्थिति में तुम्हारी रहूँगी,
आकर्षण नहीं, चाह नहीं—तुम मुझमें बसे हो।
कहती है—मैं पुजारन हूँ, तुम देवता;
विषम समय में तुम्हें अपने पास ले जाऊँगी;
सेवा भी प्रेम है, त्याग भी प्रेम है;
जुदाई की कोई भाषा मेरे शब्दकोश में नहीं;
मेरे लिए प्रेम स्थिर है, समय से परे;
और स्थिरता ही सच्चाई का प्रमाण।
पर आज एक रात ने प्रश्न खड़े कर दिए;
पूछती है—उनके पास सोए होगे?
मन खिन्न है, आना नहीं चाहती;
मात्र एक परिवर्तन—और भरोसा डगमगा गया;
क्या यह अधिकार के छिनने का भय था,
या प्रेम का नाम लेकर उपजा अविश्वास।
मैं सोचता हूँ—प्रेम विश्वास से चलता है;
समझौते उसकी साँस हैं;
साथ रहने से पहले स्थायित्व की कसौटी कठिन है;
यदि एक रात से प्रेम हिल जाए,
तो कल का मौसम उसे और हिलाएगा;
इसी चिंतन में ब्रेकअप का बीज छुपा है।
प्रेम बाँधना नहीं, ठहरना सिखाता है;
अधिकार नहीं, भरोसा माँगता है;
जो साथ होकर भी असुरक्षित हो,
वह नाम भले जीवन का ले,
पर जीवन का धैर्य अभी सीखना शेष है।
5)
उड़ान का भरोसा
मोह में तुम उसे कसकर थाम लेते हो,
इस डर से कि वह कहीं और की न हो जाए;
लेकिन प्रेम कहता है—
हथेलियाँ खोलो, पिंजरे नहीं, आकाश बनो;
जो तुम्हारा है, वह उड़कर भी तुम्हारे ही नाम लौटेगा;
क्योंकि सच्चा प्रेम बाँधता नहीं,
विश्वास की डोर से स्वयं बँधा रहता है।
6)
भरोसे की कसौटी
तुम कहती हो, मुझे स्वतंत्र रहना पसंद नहीं है;
मुझे अच्छा लगता है तुम्हारी निगरानी में रहना;
जहाँ मेरी कोई बात अनुचित लगे, जहाँ कोई व्यक्ति तुम्हें अखरे;
वहाँ पूरे अधिकार से मुझे टोक देना, रोक देना, समझा देना;
तुम्हारी खुशी के बदले मुझे कोई रिश्ता, कोई बातचीत मंजूर नहीं।
बस एक बात मत करना;
बिना आधार के शक, बिना वजह आरोप;
क्योंकि वह मेरे आत्मसम्मान को चीर देता है;
मैंने तुम्हारे साथ रहकर इज्जत का अर्थ सीखा है;
मैं तुम्हें कभी लज्जित नहीं करूंगी, न आचरण से, न विचार से।
मैं कहती हूँ, तुम्हारे प्रेम के लिए;
दुनिया की सारी खुशियाँ तुम्हारे चरणों में रख दूँ;
अपना सर्वस्व अर्पित कर भी मुझे कमी नहीं लगे;
तुम्हारे सिवा मुझे किसी और खुशी की चाह नहीं;
मेरे लिए प्रेम ही मेरी मर्यादा है।
रात के आठ बजे हैं;
भयंकर कोहरा, सर्द हवाएँ दिमाग चीरती हुई;
बच्चे सो गए होंगे, गाँव सवाल करता होगा;
अकेली स्त्री, सुनसान रास्ते, झाड़ियाँ और डर;
फिर भी मैं रोज लौटती हूँ, सिर्फ तुम्हारे प्रेम के भरोसे।
खतरे मुझे दिखते हैं;
हमला, अपमान, यहाँ तक कि मृत्यु का साया भी;
फिर भी मैं डर को ताक पर रख देती हूँ;
क्योंकि तुम्हारे प्यार के आगे परिणाम छोटे पड़ जाते हैं;
यह एक दिन की नहीं, रोज की सच्चाई है।
मैं तुम्हारे मित्रों से मिलती हूँ;
हौसले के साथ कहती हूँ, मैं इनकी बीवी हूँ;
लोग सवाल उठाते हैं, सच की कसौटी रखते हैं;
मैं कह देती हूँ, इनकी दूसरी बीवी हूँ;
और तुम सबके सामने मुझे स्वीकार कर लेते हो,
मैं खुशियों से नाच उठती हूँ; तुम पर कुर्बान हो जाती हूँ।
तब मैं रो पड़ती हूँ;
अजनबियों के बीच तुम्हारे गले लग जाती हूँ;
मैं स्त्री हूँ, मेरी मर्यादा है;
पर तुम्हारा प्रेम ही मेरी मर्यादा बन जाता है;
यही मेरा धर्म, यही मेरा विश्वास है।
अब तुम बताओ;
मेरी औकात क्या है, मेरा प्रेम कितना है;
क्या मैं अब भी अधूरी लगती हूँ;
क्या तुम्हें अब भी मुझ पर भरोसा नहीं;
कि मैं सिर्फ तुम्हारी भजन करती हूँ।
क्या तुम्हें अब भी लगता है;
कि मैं प्रेम का नाटक कर सकती हूँ;
कि किसी गैर की बाहों में खो सकती हूँ; नहीं;
मेरा प्रेम कोई अभिनय नहीं, कोई समझौता नहीं;
यह रोज चुना गया साहस है, रोज निभाई गई निष्ठा है;
जिसे साबित करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं,
सिर्फ़ तुम्हारा निश्चिन्त विश्वास ही पर्याप्त है।
7)
समर्पण
जब मिली थी, तब सिर्फ़ आकर्षण था;
एक सुंदर व्यक्तित्व, एक सुंदर चेहरे का;
यह नहीं जानती थी कि आप एक वास्तविक पुरुष हैं;
आज आप मेरे जीवन का वह केंद्र हो;
जिसके चरणों की धूल मैं अपनी माँग में भरती हूँ।
आप ने मेरे जैसे रेंगते हुए कीड़े को उठाया;
और अपने सर का ताज बना लिया
और मेरे अस्तित्व को
ज़मीन से उठाकर ताजमहल-सा खड़ा कर दिया;
मेरी आँखों में स्वर्ग का सपना भरा;
और उसे यथार्थ में बदल दिया।
आप ने मुझे जीवन देखने की दृष्टि दी;
मेरे अस्तित्व में चार चाँद लगाए;
जीने की हुनर सिखाई;
रंगों से मुझे भर दिया;
और मेरा संसार रंगीन बना दिया।
आप ने मुझे ऐसे सजाया
जिनकी कल्पना मैं कभी नहीं सकती थी;
नौकरी और कठोर मेहनत के बाद भी;
ऐसा जीवन संभव नहीं था;
जैसा जीना आप ने मुझे सिखाया है।
अब हर क्षण सोचती हूँ;
कि तिनके-भर भी भूल न करूँ;
आप के दिल को कभी ठेस न पहुँचे;
कोई पाप, कोई अपराध न हो;
मेरे मन में आप के सिवा कोई न बसे।
आप मेरे लिए देवता से भी ऊपर हो;
‘प्यार’ शब्द बहुत छोटा लगता है;
समर्पण भी अधूरा जान पड़ता है;
मैं प्रेम से कहीं अधिक आप की हूँ;
और उससे भी आगे समर्पित हूँ।
मैं नहीं जानती;
आप के लिए मैं क्या हूँ;
और कितना विशिष्ट, कितना पवित्र बनूँ;
पर इतना जानती हूँ;
आपने मुझे जीवन, संयम और पवित्रता सिखाई है।
हर हाल में आप की हूँ;
रहूँगी, हर जन्म में;
आप की एक पवित्र, अनछुई दासी बनकर;
यही मेरी कामना, यही मेरा धर्म;
यही मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व है।
8)
उद्दीपन
मैंने तुम्हारी अंतर्चेतना पढ़ी;
तुम्हारा हृदय मेरे सामने खुला;
आकर्षण से देवत्व तक की यह यात्रा;
दरअसल प्रेम की नहीं, चेतना की साधना है।
प्रेम सच में आकर्षण से शुरू होता है;
पर वहीं ठहरता नहीं;
वह मन को मांजता है, आत्मा को उज्ज्वल करता है;
और मनुष्य को मनुष्यता के शिखर तक ले जाता है।
तुमने कीचड़ को पहचाना;
और वहीं रुक जाने को जीवन नहीं माना;
तुमने स्वयं को शुद्ध जल तक पहुंचाया;
यही तुम्हारा विवेक है, यही तुम्हारी महानता है।
हर कोई मानुष तन पाकर भी;
मानुष होना नहीं सीख पाता;
तुमने तन को निर्विकार किया;
इसलिए तुम्हारे भीतर मनुष्यता का श्रेष्ठ गुण प्रकट हुआ।
तुम मुझे श्रेय देती हो;
पर सत्य यह है कि मैं केवल उद्दीपन हूँ;
साधन हूँ, माध्यम हूँ;
साध्य तो तुम स्वयं हो।
जो कुछ उज्ज्वल हुआ है;
वह बाहर से नहीं आया;
वह तुम्हारे भीतर ही था;
बस तुम्हारी चेतना ने उसे प्रकाशित किया।
जिस दिन तुम्हारे मन की हलचल मैंने महसूस की;
उसी क्षण मैंने तुम्हें आत्मसात किया;
जिस दिन तुम मिलने को व्याकुल हुईं;
मेरे ब्रह्मांड में कंपन फैल गया।
जब तुम चलीं मेरी ओर;
मैं तुम्हारी प्रतीक्षा में नहीं ठहरा;
मैं तुममें विलीन हो गया;
गुलाबबाड़ी में तुम्हारे स्पर्श ने मुझे पूर्ण कर दिया।
मैं न आकर्षण में रुका;
न प्रेम की सीमाओं में बंधा;
मैं उसी क्षण सदा के लिए तुम्हारा हुआ;
निश्छल, पवित्र और सम्पूर्ण।
आज तुम मुझे पूर्ण मानकर;
अपना सम्पूर्ण सौंपती हो;
यह मेरे लिए हर्ष नहीं;
यह मेरे अस्तित्व का सौभाग्य है।
तुम्हारा अनछुई, पवित्र रहना;
अनंत काल तक मेरे में समाहित रहना;
यह मेरी भी कामना है;
यह मेरा भी सत्य है।
मैं ब्रह्मांड के सम्मुख स्वीकार करता हूँ;
तुम हर काल में मेरी रहो;
मैं हर युग में तुम्हारा रहूँ;
और हमारी साधना अनंत तक पूर्ण होती रहे।
9)
इत्मीनान
मैं तुम्हारा हूँ;
इसमें तुम्हें कोई शक नहीं;
इसी भरोसे तुम औपचारिकता नहीं करती हो;
जो मन में आया, कह दिया;
बिना हिचक ~फोन रखती हूँ, और रख दिया;
मेरे जवाब, मेरी ज़रूरतों का ख़याल नहीं;
जानती हो रिश्ते की ट्रेन का अंतिम स्टेशन यही है।
यह विश्वास ही तो है;
प्रेम की सबसे नाज़ुक पहचान;
दरवाज़े पर जब भीड़ जमा होती है;
तुम उनसे काम लेने में पूरा समय देती हो;
बिना हिचक कि मैं क्या महसूस कर रहा हूँ;
क्योंकि वे गैर हैं; और मैं तुम्हारा हूँ।
लेकिन तुम्हें नहीं पता;
एक ही पल में मैं गैर हो जाता हूँ;
और गैर अपने बन जाते हैं;
रिश्ते अक्सर यूँ ही उलट जाते हैं;
बिना शोर, बिना चेतावनी।
अपने हमेशा अपने होते हैं
गैर हमेशा ग़ैर;
नौकर की औकात चौखट है; बेडरूम नहीं;
यह फर्क हमेशा बना रहना चाहिए;
यह फर्क हमेशा याद रखना चाहिए।
मुझे शिकायत नहीं;
बस इत्मीनान चाहिए;
बुरे से बुरे समय में भी;
धैर्य का एक छोटा सा मिनट;
क्योंकि अगर वह भी न मिला;
तो मेरे अंधेरे और तुम्हारे विश्वास में क्या अंतर।
10)
सशंकित प्रेम
तुम मुझे बेइंतहा प्यार करती हो;
इसमें मुझे कोई शक नहीं;
और मैं भी तुम्हें बेदाग चाहता हूँ;
यह सच मेरी हर साँस में शामिल है।
कभी-कभी मन में एक डर उठता है;
कि कहीं कोई तुम्हें ताड़ तो नहीं रहा;
याद करने, फोन करने, मिलने का सिलसिला;
चुपचाप आगे बढ़ा तो नहीं रहा है।
डर इस बात का नहीं
कि वह तुमसे प्रेम करता होगा;
डर उसके दिखावे का है;
कि वह दुनिया से कहता फिरेगा;
‘वह मेरी चहेती है, मेरी प्रेमिका है’।
मुझे यह आशंका भी सताती है;
कि अधिक बातचीत से कहीं;
तुम्हारे भीतर प्रेम का अंकुर;
अनजाने ही न फूट पड़े।
मेरा यह शक यूँ ही नहीं है;
काश तुमसे वह भूल न हुई होती;
तो मेरा दिल इतना सशंकित न रहता;
और जीवन कितना निर्द्वंद्व होता।
तुम आज़ाद पक्षी होतीं;
मैं पूरी तरह बेफिक्र होता;
और हमारा प्रेम;
बिना भय के सांस लेता।
मैं किसी अदृश्य शक्ति से प्रार्थना करता हूँ;
कि वह मेरे मन से सब कुछ इरेज कर दे;
क्योंकि भूल ही शायद वह रास्ता है;
जहाँ मन का भार खत्म होता है।
अगर स्मृतियाँ हल्की हो जाएँ;
तो प्रेम फिर से पवित्र लगने लगेगा;
और उस पवित्रता में;
हम दोनों निश्चिंत खड़े मिलेंगे।
11)
अधूरापन
कितना भी कर लिया जाए;
कहीं न कहीं कुछ अधूरा रह ही जाता है;
पूरी नीयत, पूरा समय, पूरी मेहनत के बाद भी;
पीछे मुड़कर देखो तो कोई कोना खाली दिख जाता है।
कभी यह खालीपन अपनी उम्मीदों से बनता है;
कभी दूसरों की नज़र से;
और अक्सर वही सबसे पहले दिखाया जाता है;
पूरी रोशनी छोड़कर छाया गिन ली जाती है।
लोग पूरे प्रयास को नहीं देखते;
वे उस छोटी-सी कमी को देखते हैं;
जहाँ से सवाल उठाया जा सके;
जैसे वही आपकी पहचान हो।
आप जितनी शांति से दायित्व निभाते हैं;
उतनी ही आसानी से कमियाँ गिना दी जाती हैं;
उस पल भीतर कुछ चुपचाप टूटता है;
क्योंकि दिया हुआ नहीं, छूटा हुआ सामने आ जाता है।
कमियाँ केवल बातें नहीं होतीं;
वे सीधे आत्मसम्मान को छूती हैं;
मन खुद से पूछता है;
क्या मेरी ईमानदारी भी कम पड़ गई।
अफसोस गलती का नहीं होता;
अफसोस इस बात का होता है;
कि पूरी सच्चाई के बाद भी;
सिर्फ़ कमी ही देखी गई।
सबसे ज़्यादा दर्द तब होता है;
जब गिनती अपनों की ज़ुबान से आती है;
जिनके लिए खुद को पीछे रखा था;
अपने समय और सुख को टाल दिया था।
तब समझ आता है;
निस्वार्थता हर बार सम्मान नहीं पाती;
जितना ज़्यादा आप देते हैं;
उतनी ही अपेक्षाएँ और शिकायतें बढ़ती हैं।
दुनिया पूर्णता को नहीं;
सहूलियत को महत्व देती है;
जब तक आप काम आते हैं;
आप अच्छे कहलाते हैं।
एक छोटी-सी चूक;
सालों की मेहनत पर भारी पड़ जाती है;
सारी अच्छाइयाँ एक पल में;
हल्की कर दी जाती हैं।
ऐसे समय खुद को संभालना कठिन होता है;
मन बार-बार कहता है;
काश थोड़ा और कर लिया होता;
थोड़ा और सह लिया होता।
धीरे-धीरे यह भी समझ आता है;
इंसान होना ही अपूर्ण होना है;
हर सीमा पार कर पाना;
किसी के बस की बात नहीं।
कमी रह जाना असफलता नहीं;
यह इंसानी सच है;
और इस सच के साथ;
आगे बढ़ना ही जीवन है।
जब चोट और अफसोस साथ होते हैं;
चुप्पी मजबूरी बन जाती है;
क्योंकि जो समझेगा;
वह बिना कहे समझ जाएगा।
और जो नहीं समझना चाहता;
उसे शब्द भी नहीं बदल पाएँगे;
उस चुप्पी में थकी हुई स्वीकृति होती है;
कि अब हर किसी को खुश करना ज़रूरी नहीं।
शायद परिपक्वता यहीं से शुरू होती है;
जब आप मान लेते हैं;
लोग कमियाँ गिनाएँगे;
चाहे आप कितना भी कर लें।
हर चोट का जवाब देना आवश्यक नहीं;
कुछ अफसोस ऐसे होते हैं;
जिन्हें साथ लेकर ही चलना पड़ता है;
बिना शोर, बिना शिकायत।
आख़िर में बस यही देखना होता है;
क्या आपने क्षमता भर ईमानदारी से किया;
अगर जवाब हाँ है;
तो दूसरों की गिनती आपकी पहचान नहीं।
कमियाँ रहेंगी;
चोट भी लगेगी, अफसोस भी होगा;
लेकिन भीतर का संतोष कहेगा;
कि आपने छल नहीं किया।
उसी संतोष के सहारे;
इंसान फिर उठता है, फिर चलता है;
थोड़ी कम उम्मीदों के साथ;
और थोड़ी ज़्यादा शांति के साथ।
13)
प्यार भी एक क्रांति है
प्यार किसी नारे से नहीं;
बल्कि साहसिक स्वीकार से शुरू होता है;
इसलिए प्यार किसी क्रांति से कम नहीं है।
प्रेमी कोई कोमल स्वप्नदर्शी नहीं होते;
वे अपने डर, सुविधा और स्वार्थ के विरुद्ध खड़े लोग होते हैं;
इसलिए प्रेमी द्वय क्रांतिकारी जैसे सच्चे होते हैं।
जहाँ दुनिया समझौते सिखाती है;
वहीं प्रेम जोखिम उठाना सिखाता है;
यही जोखिम उसे क्रांति बनाता है।
प्यार में हथियार नहीं होते;
लेकिन आत्मसम्मान होता है;
और वही सबसे धारदार शस्त्र है।
प्रेमी सत्ता से नहीं डरते;
वे अकेले पड़ जाने से भी नहीं डरते;
क्योंकि उनके पास एक-दूसरे का सच होता है।
यह प्रेम फूलों की सेज नहीं;
काँटों पर चलने का अनुशासन है;
और इसी में उसकी क्रांतिकारिता है।
जो प्यार को कमजोर समझते हैं;
उन्होंने कभी उसे निभाया नहीं;
वरना जान जाते कि प्यार भी एक विद्रोह है।
14)
नदी के दो किनारे
तुम पूछती नहीं,
और मैं हर रात चुपचाप सोचता हूँ;
मेरी मोहब्बत का अंत क्या होगा,
उत्सव की थाली या पतझड़ की चादर।
कभी लगता है—हमने एक दूजे के हद को नहीं समझा,
दुनिया की दीवारों पर इश्क़ की कील ठोक दी;
कभी डर लगता है—ये दीवारें
कहीं हमारे ही माथे पर न गिर पड़ें।
मैं तो मोहब्बत पर फना हूँ,
तुम्हारी एक हँसी पर अपनी पूरी ज़िंदगी रख दूँ;
पर तुम,
घर, बच्चे, समाज—इन तीन दिशाओं में
अपने ही टुकड़ों को समेटे खड़ी हो।
तुम्हारा साहस रोज़ मेरे पास आता है,
और हर शाम दरवाज़े पर
अपने जूते उतार कर लौट जाता है;
मैं समझता हूँ—
जड़ों से उखड़ना पेड़ों के बस की बात नहीं।
कहीं ऐसा न हो
कि हमारी मोहब्बत ही
अपने ही बोझ से फना हो जाए;
और हम सिर्फ दस्तानों में बचे रहें—
स्पर्श की याद, गर्माहट का वहम।
हमारी मोहब्बत
नदी के दो किनारों सी है—
बहती हुई, साथ-साथ;
मिलने की जिद्द में नहीं,
चलते रहने की मजबूरी में।
अजीब उलझन है,
और उतनी ही अजीब कशिश भी;
शायद यही हमारी मोहब्बत का सच है—
पूरा न होकर भी
खुद को तुम में लगातार जीते रहना।
15)
सहमतियों का प्यार
प्यार तो तुम तब भी करती थीं;
प्यार अब भी करती हो;
न कल प्यार कम था;
न आज ही कम है;
बस बदल गई हैं सहमतियाँ;
बदल गया है प्यार का व्याकरण।
कल तुम्हारा प्यार भावनात्मक यथार्थ था;
तुम कुछ भी करने को तैयार थीं;
जो करती थीं; परम आनंद में डूबकर करती थीं;
मैं तुम्हें द्वेष-रहित; पूर्ण सत्य लगता था;
तुम बिना किसी शर्त के मुझे स्वीकार करती थीं।
आज तुम्हारा प्यार यथार्थवादी हो गया है;
तुम भावना-प्रधान नहीं रहीं;
तुम मेरी भावनाओं का भी यथार्थ समझना चाहती हो;
आज भी तुम मेरे लिए सब कुछ कर सकती हो;
लेकिन परिस्थितियों का मूल्यांकन मेरी परीक्षा बन जाता है।
कल मैं इतना पवित्र और भोला था;
कि मेरी एक इच्छा पर तुम
अपने पूरे शरीर पर गुदवा सकती थीं;
आज मैं पवित्रता की कसमें खाकर भी;
तुम्हारे किसी गैर-ज़रूरी अंग पर
कुछ अंकित करने को कहूँ;
तो तुम उसे चुपचाप टाल देना चाहोगी।
आज भी तुम जान दे सकती हो;
पर यह सिद्ध होने के बाद;
कि मैं तुम्हारे बाद भी सिर्फ तुम्हारा ही रहूँगा;
कल तुम निर्द्वंद्व थीं;
आज द्वंद्व उभर आया है;
सच क्या है; यह तुम जानो;
मैं तो उतना ही पवित्र हूँ; जितना कल था;
बस इतना बदला है;
कल मैं आकर्षित था; आज मैं प्यार करता हूँ;
कल तुमने मुझे अपनाया था;
आज मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता।
16)
मैं सपना को प्रेम करता हूँ
तुम मुझे प्रेम करती हो; मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ;
प्रेम एक हक़ीक़त है; जो सांसों में बसती है;
और तुम; एक हसीन सपना हो; जो आंखों में उतरता है।
हक़ीक़त मुझे चलना सिखाती है;
सपना मुझे उड़ना सिखाता है;
दोनों के बीच मैं तुम्हें चुनता हूँ; बिना किसी तर्क के।
जब तक सोऊँ; तुम्हारी गोद में सोऊँ;
यही मेरी थकान की आख़िरी दवा है;
इसमें न कोई अपराध है; न कोई स्वार्थ।
अगर प्रेम सच है;
और सपना सुंदर है।
17)
जीवन की सुगंध
जीवन की “सुगंध” का आनंद वही ले सकता है;
जो “खिलने” और बिखरने;
वाले पलों के बीच;
ठहर कर साँस लेना जानता हो;
जो सफलता की धूप में;
अहंकार से नहीं;
कृतज्ञता से महकता हो।
जो जानता हो कि;
हर फूल हमेशा डाल पर नहीं रहता;
कुछ फूल गिरकर भी;
धरती को सुगंधित करते हैं;
और कुछ आँसुओं की नमी में;
जीवन का असली इत्र;
घुलकर फैल जाता है।
जो टूटने को अंत नहीं;
रूपांतरण समझता हो;
जो बिखरने के बाद भी;
अपने अस्तित्व को;
समेट लेना जानता हो;
और खामोशी के क्षणों में भी;
अपने भीतर की खुशबू;
जगाए रखता हो।
क्योंकि जीवन केवल;
खिलने का उत्सव नहीं;
बिखर कर भी;
महकते रहने की कला है;
और वही व्यक्ति;
जीवन की “सुगंध” को;
पूरी गहराई से;
महसूस कर पाता है।
18)
विश्वास
मैं सब कुछ तोड़ सकता हूँ—
ख़ामोशियाँ, दीवारें,
अपने ही भीतर के शोर तक;
पर उसके विश्वास को नहीं,
क्योंकि वह बहुत मासूम है,
और उसकी सच्चाई काँच नहीं—
दूध जैसी है,
जिसमें ज़रा-सी मिलावट
पूरी दुनिया को अपवित्र कर दे;
इसलिए मैं खुद को तो तोड़ लूँगा,
पर उसकी आस्था पर
एक भी दरार नहीं आने दूँगा।
19)
मेरी हमनफ़स
मेरी हमनफ़स—
सिर्फ़ साथ चलने वाला नाम नहीं;
वह साँसों के बीच ठहराव है,
थकन में रखा गया भरोसा है।
मेरी हमनफ़स—
भीड़ में पहचानी हुई ख़ामोशी;
आँखों की भाषा समझ लेने की क्षमता,
बिना पूछे हाथ थाम लेने का साहस।
मेरी हमनफ़स—
गलतियों पर दंड नहीं,
सुधरने का अवसर है;
गिरने पर उठाने वाली दृढ़ मुस्कान है।
मेरी हमनफ़स—
कल का सपना नहीं,
आज का संबल है;
जहाँ मैं पूरा नहीं, वहाँ वह पूरी उम्मीद है।
यही हैं मेरी हमनफ़स के मायने।
20)
नंगे पाँव सपना
कल सोचते-सोचते मैं रो पड़ी;
कि एक दिन मैं प्रोफेसर बन चुकी हूँ;
और तुम अचानक नंगे पाँव मेरी यूनिवर्सिटी में आ खड़े होते हो;
गर्म फर्श, धूप से भरे गलियारे, और तुम्हारी थकी मुस्कान।
मैं तुम्हें देखते ही दौड़ पड़ती हूँ;
भीड़, किताबें, कुर्सियाँ—सब पीछे छूट जाता है;
तुम्हारा पैर अपने सिर पर रख लेती हूँ;
और काँपती आवाज़ में कहती हूँ—मैं सफल हो गई हूँ।
मुझे नौकरी मिल गई;
तुम्हारे प्रयास सफल हुए;
तुम्हारा सपना पूरा हुआ;
मेरी आँखों से कृतज्ञता बहती रहती है।
मैं बार-बार तुम्हारे पैरों को चूमती हूँ;
आशीर्वाद को माथे से लगाती हूँ;
कैंपस के बच्चे, प्रोफेसर, सब देखते रह जाते हैं;
और मैं तुम्हें गले लगाकर पागलों की तरह रोती जाती हूँ।
तुम मेरे लिए पहले अध्यापक ड्यूशेन हो;
जिसने अक्षरों से पहले मुझे साहस सिखाया;
जिसने मेरे भीतर सोई हुई लड़की को;
ज्ञान की रोशनी तक नंगे पाँव पहुँचाया।
और मैं तुम्हारी आलतिनाय हूँ;
जो हर सफलता में तुम्हारा नाम लिखती है;
जो मंच पर खड़ी होकर भी;
अपने पहले अध्यापक को प्रणाम करती है।
उस क्षण मुझे अपनी डिग्री नहीं दिखती;
मुझे सिर्फ तुम्हारा नंगे पाँव चलकर यहाँ तक आना दिखता है;
मेरी सफलता तुम्हारे श्रम की भाषा बन जाती है;
और प्रेम, सम्मान में बदलकर खड़ा हो जाता है।
उस दिन मैं समझती हूँ;
कि ऊँचाइयाँ इमारतों से नहीं बनतीं;
वे उन पैरों से बनती हैं;
जो सपनों के लिए धूल ओढ़कर चलते हैं।
21)
ठंड की हार
आज घर से बाहर नहीं निकली हूँ;
क्योंकि बाहर कड़ाके की ठंड है;
खिड़की पर जमा कोहरा मुझे रोक लेता है;
और मैं अपनी ही सोच पर मुस्कुरा उठती हूँ;
कि कल तो इससे भी भयंकर ठंड थी।
कल मैं तुम्हारे साथ सड़क पर उड़ रही थी;
स्कूटी की रफ्तार में सपने बंधे थे;
नदी के किनारे का कोहरा रेशम-सा लिपटा था;
मफलर के बिना बर्फ़-सी हवाएँ गालों को काटती थीं;
और हम उन्हें हँसते हुए झेल रहे थे।
जब तुम कसकर मेरी कमर पकड़ते थे;
तो माथे पर पसीना उतर आता था;
दिल की उमंगों के साथ साँसों की गर्मी बढ़ जाती थी;
सोचती हूँ तुम्हें पाकर मैंने जहाँ पा लिया है;
तुम्हारे साथ हरारत इतनी बढ़ जाती है कि बर्फ़ भी पिघलने लगता है।
अब यह ठंड भला क्या चीज़ है;
जो मुझे घर में रोक सके;
जब तुम्हारा साथ मेरी रगों में आग बनकर बहता है;
मैं हँसकर कह देती हूँ खुद से;
यह ठंड कुछ भी नहीं।
22)
पहला अध्यापक
मैं तुम्हें प्रेम नहीं;
इतिहास देना चाहता हूँ;
मैं तुम्हें अपनी नहीं;
समय की स्मृति बनाना चाहता हूँ।
मैं चाहता हूँ तुम अल्तीनाय बनो;
और मैं वही गुमनाम ड्यूशेन;
जिसका नाम किताबों में नहीं;
पर चेतना की रीढ़ में दर्ज हो।
मैं तुम्हें शब्द नहीं;
दृष्टि दूँगा;
डर नहीं;
विरोध करने की आदत दूँगा।
तुम पढ़ोगी केवल अक्षर नहीं;
तुम पढ़ोगी सत्ता की चालें;
तुम जानोगी कि ज्ञान;
कैसे गुलामी की जड़ों पर प्रहार करता है।
तुम्हारी आवाज़ जब;
भीड़ को प्रश्न करेगी;
मैं पीछे बहुत पीछे;
एक परछाईं-सा खड़ा रहूँगा।
मैं मंच नहीं चाहूँगा;
नारे नहीं, जयकार नहीं;
बस इतना कि कोई कह दे—
‘वह स्त्री यूँ ही नहीं बनी थी।’
तुम इतिहास के शिखर पर बैठी;
जब लिखोगी अपना नाम;
मैं मिट्टी में उँगली से;
मुस्कराकर एक रेखा खींच दूँगा।
क्योंकि पहला अध्यापक;
कभी आगे नहीं चलता;
वह तो रास्ता बनाकर;
खुद धूल में गुम हो जाता है।
अगर लोग पूछें—
इसे किसने गढ़ा;
तो कहना—
एक आदमी था,
जिसने प्रेम को शिक्षा बना दिया।
डॉ. आर डी आनंद
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