........एआई

वरिष्ठ पत्रकार एवं कवि सुधीर राघव
एआई
शिक्षा की दुकानों में
जब से
बाबू बनाए गए इंसान
श्रम का दर्जा हो गया दोयम
तब से
रोज फटकार खाता है रामू
बौद्धिक अवतार से
जो फैल गये हैं हर तरफ
हर रूप में
बैठे हैं हर ऑफिस में
हर कुर्सी पर
दिनभर खटर-पटर करते हैं
कंप्यूटर पर
लेपटाप पर
नचाते हैं उंगलियां
मोबाइल पर
न जाने क्या-क्या लिखते हैं
और ढूंढते हैं क्या-क्या
सब के सब
काम न करने के लिए
लेते हैं सरकार से वेतन
और
काम करने के लिए
उन्हें चाहिए
घूस।
मूस जितना खाएगा
उतना मोटाएगा
वह नहीं भाग पाएगा
एक दिन बाघ आएगा
यही नियति है
दिन भर ईंट-गारा
ढोकर
रामू खा जाता है दस दस रोटी
एक ठौर बैठकर
मगर
सब बुद्धि वाले
आटा कम खाते हैं
डाटा ज्यादा पौंकते हैं
उनकी चैटिंग सेटिंग
डेटिंग शॉपिंग
धंधा-पानी सब इंटरनेट पर है
जिसे लगातार पढ़कर मशीनें
हो गई हैं होशियार
कह रही हैं
अब से सारा बौद्धिक काम वे करेंगी
यह सुनकर
सकते में हैं
सारे बाबू
सारे बौद्धिक अवतार
बस खुश हैं रामू
क्योंकि ईंटा नहीं ढोएगी एआई
इंसान के पंजे की पकड़
और कलाई का लोच
तब श्रम को विजेता बनाएगा
जब बुद्धि का हर काम
संभाल लेगी
मशीन।
- सुधीर राघव