ज़ालिम सर्दी

पेंटिंग क्रेडिटः प्रो. उत्तमा दीक्षित
ज़ालिम सर्दी फिर आई है,गर्मी को शरमाते
जाड़ा पाला,धुंध ओ कोहरा,सबकी चढ़ीं बारातें
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ठंडी सन सन हवा की देखो,फिर से तनी कनातें
दिन बेचारा दुबक गया है,लंबी होती रातें
धनवानों के भाग बड़े हैं,पिकनिक रोज़ मनाते
क्रिसमस डे,हैप्पी न्यू ईयर,जाम खूब छलकाते
चिकनसूप गाजर का हलवा،खूब खिलाते,खाते
मफलर,जैकेट में सज धजकर,लॉन्गड्राइव पर जाते
मेड़ पे बैठा होरी फिर,जबरा से लिपट गया है
पूस की सर्दी में तन उसका,सारा अकड़गया है
हर सू फैली धुंध की चादर,हुई चांदनी मैली
कंबल बांटेंगे नेता जी,पहले कर लें रैली
हल्कू इसी आस में अबकी,गांव से शहर,गया है
कंबल का सपना,उसकी आंखों में ठहरगया है
रकम बचाई थी,जो उसने,बाकी मेंफिर गई है
बेबस मुन्नी की, फिर देखो,आँखें छलक गई हैं
पूस रात की सर्द हवाएं,थर थर कांपेदादी
किटकिट किटकिट दांत बज रहे ओसमें भीगी वादी
जब अलाव जलते,सड़कों पर,सबकेदिल खिल जाते
उन होंठों पे हंसी थिरकती,जो हैं हाड़ कंपाते
अभी जिंदगी बाकी यारो,जी लें रोते गाते
अगली ठंड तक बचे रहे बस ,खुद कोही समझाते
चूल्हों की कुछ गर्म आंच में,शकरकंद और आलू
भुनी मकई और मूंगफली हो,गर्म गर्म हो बालू
आग तापने को मिल जाए,रुखी सूखी खाते
दिन में कुछ रोजी लग जाए,चैन से कटें रातें
अस्सी फीसद आबादी का,बस ये ही है, सपना
नाहीद अपनी यही दुआ है, देश सुखी हो,अपना
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बक़लम खुद
मिस नाहीद बदर
एसोसिएट प्रोफेसर
डिपार्टमेंट ऑफ फिलासफी
के के एम कॉलेज, जमुई
बिहार,पिन कोड 811307