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कविता

मज़दूर आंदोलन से संबद्ध डॉ. आरडी आनंद की कविता --- माता सावित्रीबाई फुले

संपादकीय टीम 4 जनवरी 2026 को 05:11 pm बजे
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माता सावित्रीबाई फुले

सावित्रीबाई फुले—नाम नहीं, एक आलोक हैं;
जिसने अंधकार को आँखों में देखा,
और कहा—‘अब और नहीं’;
जिस दिन उन्होंने हाथ में किताब उठाई,
उस दिन इतिहास ने करवट ली।

सावित्रीबाई ने शिक्षा को हथियार बनाया;
जहाँ परदे थे, वहाँ उन्होंने खिड़कियाँ खोलीं;
जहाँ स्त्रियाँ बोलने से डरती थीं,
वहाँ उन्होंने कहा—‘बेटी, कलम उठा।’

सावित्रीबाई फुले ने समाज से नहीं,
उसकी जड़ों से लड़ा;
उन्होंने मंदिर नहीं, विद्यालय रचे—
जहाँ पूजा नहीं, प्रश्न पूछना सिखाया जाता था।

वो हर अपमान पर मुस्काईं,
हर ताने को तर्क में बदला;
और जब उन पर कीचड़ फेंका गया,
तो उन्होंने वही कीचड़ खेत में डाल
फूल उगाए—ज्ञान के फूल, आत्मसम्मान के फूल।

सावित्रीबाई फुले ने बताया—
कि स्त्री केवल देह नहीं, दिशा है;
कि विद्या केवल अक्षर नहीं, अधिकार है;
और यह कि समाज तभी बदलेगा—
जब उसकी बेटियाँ पढ़ेंगी।

सावित्रीबाई आज भी चलती हैं—
हर स्कूल के दरवाज़े से भीतर आती हैं;
हर लड़की की आँखों में उजाला बनती हैं;
क्योंकि सावित्रीबाई फुले कोई कहानी नहीं,
वह वह शुरुआत हैं—
जहाँ अंधकार के बाद,
प्रथम सूर्योदय हुआ था।
—डॉ. आर डी आनंद