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कविता

मेरी पुत्री उद्भवी और मैं

संपादकीय टीम 2 फ़रवरी 2026 को 05:15 am बजे
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उद्भवी मेरे आँगन में जब खिल गयी, मेरे पीड़ा को जैसे दवा मिल गयी, मेरे सपनों को जैसे हवा मिल गयी। एक सूखे मरूस्थल में बरसात सी, घुप्प अंधेरे में जैसे किरण आस की ।। 1 ।।

एक तपती दुपहरी में ज्यों छाँव सी, डूबते को समुन्दर में ज्यों नाव सी, एक उजडे बसेरे को ज्यों ठाँव सी। पंख टूटे परिन्दे को ज्यों पर लगे सोए अरमान सारे स्वंय ही जगे, आम की शुष्क बगिया में ज्यों फल लगे। सूखा संसार मोहक बनाया मेरा, कैसे अहसान प्रभु मैं उतारूँ तेरा ।। 2 ।।

तेरी किलकारी मन को रिझाती सदा, तोतली बोल, हर्षित करे, हर अदा, जब प्रथम बार मुझको तुम पापा कही, सारे जीवन में मकरन्द सी भर गयी, तू है मेरी सलोनी, जिगर की तरह, तुझसे ही मेरा-बेबी का जीवन हरा, सूखा संसार मोहक बनाया मेरा, कैसे अहसान प्रभु मैं उतारूँ तेरा ।। 3 ।।

नोट :- विवाह के 15 वर्ष बाद बेटी उद्भवी के जन्म से मेरी तथा मेरी पत्नी सुधा (बेबी) के जीवन में रोशनी और आशा का संचार हो गया। विलम्ब से शिशु का सुख पाने वाले सभी दम्पत्तियों को समर्पित है मेरी यह कविता।