मॉं केंद्रित 7 कविताएँ : देवेन्द्र आर्य

देवेन्द्र आर्य
मॉं
कभी मारा भी
तो छाती से लगा हिलक हिलक रोई
मैं देखता रहा अचकचा कर
माँ के आंसू भीगे गालों ने
मेरे आंसू पोछ दिए
आंचल बन गए माँ के गाल
ऑंसुओं में मुस्कुराती मॉं
बहुत सुंदर लगती है
जैसे कई दिनों बाद निकली जाड़े की धूप
मैं नदी के सीने में झांक पाया
निर्मल
कितनी पवित्र लग रही थी माँ की हंसी
(2)
मैं तुम्हें प्यार नहीं करता माँ
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तुम्हें कैसे प्यार करूँ तुम्हें मां !
तुमने मुझे प्यार किया सिर्फ़ मुझे
या मेरे बेटे को
मेरी पत्नी को नहीं
उसे तुम घर आई पढ़ी-लिखी नौकरानी समझती रही
बिना मूछ का मर्द जो मेरी अनुपस्थिति में
बाहर की ज़िम्मेदारी भी सम्हाल सकती है
मैं तुम्हें कैसे प्यार कर सकता हूँ माँ
कि तुम्हें उससे काम लेने का हक़ तो याद रहा
प्यार देने की ज़िम्मेदारी नहीं
तुम भूल गयी मां
कि वो भी तुम्हारी तरह एक मां है
मां ने मां को कभी प्यार नहीं किया
मैंने देखा है तुम बहन की रोटी में घी नहीं लगाती थी
और मुझे चपोड़ देती थी
सूखी ही सही पहली रोटी उसे कभी नहीं मिली
तरस जाती थी बहन खेलने के लिए
मैं अगर कभी शौक़ में भी गोझिया गढ़वाने लगूँ
तो डांट पड़ती थी - चल हट मेहरकुल्ला कहीं का
याद है माँ !
जब बहन खटपट की ख़बर लिए घर आई थी
तुमने मुझसे अकेले में कहा था कि तेरे पापा समझेंगे नहीं
तू बला टाल
जितनी जल्दी हो इसे वापस ससुराल पहुंचा दे
साम दाम दंड भेद
बहन का दर्द अभी आंसू बन बह भी नहीं पाया था
कि तुमने उसे वेद पुराण लोक-लाज
स्त्री-धर्म की चिता पर सुला दिया
सिर्फ़ पैदा करना मां होना नहीं होता माँ !
मैं तुम्हें कैसे प्यार कर सकता हूँ
मैंने तुम्हारी ममता को बेनकाब होते देखा है
कई-कई स्तर कई-कई रंग
सरासर झूठ है कि माँ वही जिसमें ममता हो
ममता-विहीन माॅंएं भरी पड़ी हैं दुनिया में
हम उन्हें देखते भी हैं
पर सबके सामने कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाते
सामने तो माँ-छाप मुनव्वर के शेर ही दुहराते हैं
अपनी माँ का बोझ पत्नी पर डाल सुर्खरू बन जाते हैं
कभी ख़ुद करना पड़े तो नरक याद आ जाये
मैं उसे कैसे प्यार करूँ माँ
जो मुझे सिर्फ़ इसलिए प्यार करे कि मैं मर्द ज़ात हूँ
सूद लौटाने वाला मूल
उसके बुढ़ापे की लाठी
उसे कंधे पर घाट पहुँचाने वाला
सच तो यह है माँ कि बुढ़ापे की लाठी बेटी ही बनती है
या बहू
ममता और ख़ुदगर्जी में भेद करने के लिए
पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी नहीं माँ
काश ! तुमने मेरे भीतर की स्त्री की हत्या न की होती
काश ! तुमने बहन के भीतर के पुरुष को
तिल-तिल कर न मारा होता
काश ! तुमने आज़ादी का पगहा मुझे
और ग़ुलामी का ज़ेवर उसे न दिया होता
मैं तुम्हें प्यार नहीं कर सकता माँ !
तुमने दूध पिलाया
और दूध का क़र्ज़ मुझसे वसूला बहू लाने के पहले
जब कभी लोगों को माँ के क़सीदे पढ़ते सुनता हूँ तो लगता है जैसे मैं साहित्य की दिल्ली में बेगूसराय का निवासी हूँ
(3)
बच्चे के पांवों से चलती है मॉं
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कितनी बार गिरा होगा
अपने पांव चलने की कोशिश में
याद नहीं
घुटनों पर चलता
कभी मेज पकड़
कभी दीवार के सहारे
कभी बेड की चादर
कभी काम निपटाती मां का लटकता आंचल पकड़ खड़ा हुआ
और गिरा लद्द से
कितनी बार उसे याद नहीं
उसे यह भी याद नहीं
कि गोद में उठाने को ललचवाती माँ
कैसे धीरे-धीरे पीछे सरकती जाती उसे खिझाती
दोनों हाथों इशारा करती
आजा ऽ आ ऽ जा ऽऽ
वह बकइयां खींचता पास आता कि दूरी बढ़ा देती माँ
उत्साहित करती आजा ऽ आ गया ऽ आजा ऽऽ
तिन्ना हो जा ऽऽ
खड़ा हो जा मेरा लाल !
लार चुआता वह
और तेजी से घुटनों पर दौड़ता
तेज और तेज
और एक दिन वह दिन
जब इतनी ताकत पैदा कर ली घुटनों ने
कि खड़ा हो गया अपने पैरों पर
ढिमलाता कई डेग दूर माँ की बाहों में आ गया
जैसे स्वर्ग से जा मिली हो धरती की ख़ुशी
जानती थी माँ कि ऐसा ही होगा
जैसे जानती है पृथ्वी
कि बीज मुस्कराएगा एक दिन
वह पहला कदम
शाबाशियों तालियों और चुम्मियों ने बच्चे को विश्वास दिलाया
कि वह सचमुच अपने पैरों पर खड़ा हो चुका है
पहली बार
पहली ही बार का अवरोध था बस
जिसे बच्चा तोड़ चुका था
अब उसे याद भी नहीं
कि कब पहली बार अपने पांव चला था
अब तक उसके पैर न जाने कितनी बार
समूची पृथ्वी धांग चुके हैं
माँ को सब याद है तारीख सहित
उसे ही पता है पहली बार
कब बच्चे ने गूं गां करते करते पहला अक्षर सीखा था
' माँ '
अब तो वह इतना बोल चुका है
कि लिखने को छोटी पड़ जाए धरती
बच्चे धरती से बड़े कब हो जाते हैं
पता ही नहीं चलता
धरती से बड़ा होने के ख़तरे माँ को मालूम हैं
मगर वह कुछ नहीं कर सकती अब
सिवा ख़ैरियत मनाने के
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(4)
कविता माँ
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कई माएँ थी मेरी
माओं सी माएँ
एक का नाम था अम्मा
एक का नाम बड़ी अम्मा
एक छोटी अम्मा
एक और आजी अम्मा
एक का नाम बुआ
एक का मौसी
एक का नाम चाची
एक का नाम आपा
एक और जिसका नाम कविता
कई माओं की गोद में खेला
कुछ के तो दूध भी पिये
सबने मिलकर मुझे पाला
पल गया तो अंतिम ने सम्हाला
बूढ़ी होती गयीं सब
मरती खपतीं बारी-बारी
बची है बस एक कविता महतारी
जब कभी ठिठोली करता हूँ अपनी इस मॉं से
क्या उमर है अम्मा
तो सिर सहला देती
कहती मुझे दुलार
मैं ने नहीं तूने मुझे ज़िंदा रखा है पगले
ये तो कहने की बात है
वरना डरता हूँ
अगर इसने भी साथ छोड़ दिया
तो कौन मन की पीर सहलाएगा ?
थका हारा टूटा
अपमानित बहिष्कृत लांक्षित दुखी तनहा
किसके पास जाकर खोलूंगा मन
किससे ताकत लेकर जीतूंगा रण
एक यही है जिसने जोत जगा रक्खी है
इस उमर में टूअर बन जाऊँ
बेहतर है उसके पहले दीवार पर टंग जाऊँ कविता मॉं!
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(5)
माँ होना परिणाम नहीं
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भविष्य नहीं
बचपन जीती है माँ
ममता के पुष्प अपने जाए पर अर्पित करती
ममता छोड़ सब नश्वर
माँ की कोख से ही पैदा हुआ ईश्वर
नहीं आता शब्द-चौकन्ना रहना कवि की तरह
पाठ-परिणाम की चिंता नहीं
गढ़ती है भोली मुस्कान
शिशु के हृदय में
माँ होने के लिए शब्द की ज़रूरत नहीं
आंकलन नहीं
आकांक्षा
जैसे न्याय का दम्भ नहीं
अन्याय का विरोध है कविता
माँ जीवन-अनुरोध
जैसे कविता की तुतलाहट समझता है कवि
समझती है माँ बच्चे का मन
सिखाता है कविता को भाषा में चीखना
चीख को चुप में गुंजारित कराता कवि
माँ सिखाती है शिशु को भाषा की उंगली थाम
'बड़ा' होना
सपनों की तरह कोमल
अरमानों की तरह कठोर
बच्चे की आंखों में आंजती है भोर
जैसे श्रेय नहीं देय है कविता
विजय नहीं युद्ध
परिणाम नहीं प्रक्रिया है माँ
धरती की लिखी
अब तक की सबसे सुंदर कविता
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(6)
पुण्यतिथि
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यह सच है मां
कि आज तुम उतनी शिद्दत से याद नहीं आईं
जितनी अनिवार्यता से तुम्हारी पहली पुण्यतिथि
पर्दे के पीछे रह जातीं घटनाएं
मंच-प्रमुख होतीं तारीख़ें
दिन दिवस उत्सव श्रद्धांजलि
दुख दर्द रिश्ते
तारीखों के बहाने सामयिक रह जाते
यादें तिथियों में बदल कर रिवाज़ बन जातीं
सच है मां कि नवम्बर चढ़ते ही तुमसे अधिक
तुम्हारे जाने की तारीख़ याद आती रही
पंद्रह नवम्बर !
व्यस्त रहे हम सोच सोच कर कि कैसे मनाएंगे
मां की पहली पुण्यतिथि
नया क्या होगा घर में दिवंगत के हिसाब से
कैसे कोई समूचा सीमित हो जाता है फोटो में
एक दिन तारा बन जाता है
समा जाता है जीवन-गंगा के ब्लैक होल में
सच है मां कि सीधे नहीं
पंद्रह नवम्बर के बहाने हमने याद किया तुम्हें
शायद ड़ूबने के बाद उबरने के लिए तुम्हारा
तारीख़ के तिनके में बदल जाना ज़रूरी था
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(7)
मां गौरैया होती है
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डैनों में जागा करती है
डैनों में ही सोती है
मां गौरैया होती है
सर पर परचम
आबे जमजम
सबके लिए छप्पनों व्यंजन
अपने लिए और थोड़ा कम
पूरे घर की दमखम अम्मा
ख़ुद होती जाती हैं बेदम
टिकुली भर की इच्छाएं हैं
सेन्दुर भर उसके सपने
आंसू संग बहवा देती है
काजल जैसे दुख अपने
रोते रोते हंसती है और
हंसते हंसते रोती है
चींचीं चींचीं
फुरफुर फुरफुर
प्यार झरा करता आंचल से
भुरभुर भुरभुर मधुर मधुर
जीवन की शुरूआत ही उसकी
होती है जीवन-कारा
बीस साल की होते होते
घर कर जाता अंधियारा
सूरज तब उगता है जब मां
साठ साल की होती है
आंगन मत छीनो औलादों
मत नोचो उसके खोते
ममता है तो नमी बची है
बचे हैं करुणा के सोते
जीवन अगर बचा है तो बस
धरती मइया के होते
सुर में शब्द उगाया करती
शब्दों में सुर बोती है
मां गौरैया होती है
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देवेन्द्र आर्य
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