वर्तमान में जारी जंग की पृष्ठभूमि में मोहम्मद शाहिद अख्तर की कविता

वो मित्र जो अमेरिकी हमलों में
ईरानी महिलाओं की मुक्ति
देखना चाहते थे
वो मित्र जो ईरान में
महिलाओं की साक्षरता दर
से नवाक़िफ़ हैं
वो मित्र जो मानते हैं
ईरानी महिलाएं क़ैद हैं
हिजाबों और घरों में
वो मित्र जो समझते हैं
स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटियां
आधी आबादी से खाली हैं
वो मित्र जो सोचते हैं
ईरान में दफ्तरों, कारखानों में
(चूल्हा और बिस्तर छोड़) औरतें कहीं नहीं दिखतीं
वो मित्र जिन्हें ईरानी मुल्ले
एप्स्टीन के ऐशगाहों में, टापू में, दावतों में
विचरते बच्ची खोरों से ज़्यादा खतरनाक दिखते हैं
वो मित्र मिनाब के स्कूल में झांकें
वहां जीवन से "मुक्त" नन्ही बच्चियों में
मिल जाएगा पश्चिम का एप्स्टीनी चेहरा
ईरानी महिलाओं के मुक्तिकामी मित्रों
मिनाब के मासूम बच्चियों का ख़ून
आख़िर तुम्हारी आंखों से क्यों नहीं छलकता?
ईरानी महिलाओं के मुक्तिकामी मित्रों
बुरा न मानना मेरी बातों का
मैं बस नन्ही लाशों से उठते सवाल दोहरा रहा हूं।