प्रेम में पराजित लड़की

प्रेम में पराजित लड़की
प्रिय अनुज डॉ. दिलखुश मीणा,
उचित अभिवादन

कुशल आंबेडकरवादी श्री ईश गंगानिया के साहसी नेतृत्व में संपादक श्री वेद प्रकाश के संपादकत्व में आकार लेने वाली पत्रिका “समय संज्ञान” में प्रकाशित आप की कविताएं बहुत सुंदर हैं। कविताओं में यथार्थ की कल्पनाएं एवं प्रवाहित भाव उच्च कोटि के हैं। निश्चित एक शोधार्थी का युवापन बहुत ही प्रखर है। आप की उम्र में मै कदापि इतना सुंदर कभी नहीं लिख पाया। अतः आप के लेखनी कौशल को बधाई देते हुए मैं आप के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ। आप की सभी कविताओं से अपना साम्य मिलते हुए भी मैंने आप की कविता “ काश! वे पढ़े लिखे होते” की निर्मम आलोचनात्मक ढंग से व्याख्या किया है। कर्कश शब्द और विचार के लिए खेद है किंतु दृष्टिकोण के सवाल के नाते मैंने यह कदम साहित्य हित और उसके सौंदर्य भाव के लिए उठाया। आशा करता हूँ आप इसे कहीं से प्रतिस्पर्धात्मक भाव व निंदा भाव नहीं समझेंगे। अब आगे…
“प्रेम में पराजित लड़की” कविता में कवि कहता है कि—“प्रेम में कई बार पराजित हुई लड़की”—तो उसका आशय केवल एक असफल प्रेम कहानी से नहीं होता, बल्कि उस मानसिक पराजय से होता है जिसमें लड़की धीरे-धीरे स्वयं प्रेम की धारणा से हार जाती है। कवि कहता है कि बार-बार ठगी गई, छोड़ी गई या अस्वीकार की गई यह लड़की किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि प्रेम की पूरी अवधारणा से पराजित हो जाती है, इसलिए वह “हर प्रेम आयाम को शंकित छलावे की दृष्टि से देखती है” और किसी भी नए संबंध को सहज भाव से स्वीकार नहीं कर पाती। कवि कहता है कि उसके भीतर यह भय स्थायी रूप से घर कर जाता है कि “इस बार भी वह कहीं प्रेम में पराजित न हो जाए”, और यही भय प्रेम की स्वाभाविक पवित्रता को आरंभ में ही दूषित कर देता है।
कवि कहता है कि—“जिस प्रेम में कलुष भाव उपजते हों; वह प्रेम कभी फलीभूत नहीं हो सकता”—तो वह प्रेम के मूल स्वभाव को स्पष्ट करता है, क्योंकि प्रेम का आधार समर्पण, विश्वास और निर्भयता है, न कि संदेह और डर। कवि कहता है कि जैसे ही प्रेम को बार-बार प्रमाण, आश्वासन और सफाइयों की आवश्यकता पड़ने लगती है, उसकी “दीर्घायु भ्रम मात्र” रह जाती है। ऐसा प्रेम आत्माओं का मिलन नहीं रह जाता, बल्कि वह “दो दिलों के बीच का वायवीय छलावा” बन जाता है, जहाँ भावनाएँ ठोस धरातल पर नहीं टिकतीं और संबंध केवल आशंकाओं तथा अधूरी उम्मीदों पर टिका रह जाता है।
कवि रूपक के माध्यम से कहता है—“दूध की जली लड़की सदैव अपने नव प्रेमी की हर चेष्टा को छाछ की तरह फूंकती है”—तो वह उस मानसिक अवस्था को उजागर करता है जिसमें अतीत की पीड़ा वर्तमान को नियंत्रित करने लगती है। कवि कहता है कि यह लड़की प्रेमी की सहज मुस्कान में भी कोई छिपा हुआ स्वार्थ खोज लेती है और उसके प्रेम-प्रदर्शन में भी भविष्य के धोखे की आहट सुनने लगती है। कवि कहता है कि “हर बात पर इतना संदेह करती है कि कभी किसी से प्रेम ही नहीं कर पाती”, और यही अति-सावधानी अंततः उसकी रक्षा नहीं करती, बल्कि उसे प्रेम से वंचित कर देती है।
कवि कहता है कि इस निरंतर संदेह का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह होता है कि “यूँ ही रीत जाता है उसका यौवन”, क्योंकि समय बीतता रहता है, अवसर निकलते रहते हैं, लेकिन वह प्रेम की उस सहज भूमि पर कदम नहीं रख पाती जहाँ विश्वास स्वतः जन्म लेता है। कवि कहता है कि उसका मन अतीत के घावों में इतना उलझा रहता है कि वर्तमान का प्रेम उसके भीतर जड़ ही नहीं पकड़ पाता।
कवि कहता है—“उसके शंकित प्रेम की ताबीर उस भावभूमि को कभी नहीं छू पाती; जो प्रेम की अंतिम सीढ़ी होती है”—तो वह यह स्पष्ट करता है कि संदेह से भरा प्रेम कभी उस अवस्था तक नहीं पहुँच सकता जहाँ आत्मा आत्मा से मिलती है और भय का पूर्ण विसर्जन हो जाता है। अंत में कवि कहता है—“विरह पीड़ा में रात-दिन जल कर घुटन से मेरी रूह काँप उठी है”—और इसी के साथ वह यह स्वीकार करता है कि “बहुत भयावह होता है प्रेम में पराजित हुई लड़की से प्रेम किया जाना”, क्योंकि उस प्रेम में केवल लड़की ही नहीं, उसका प्रेमी भी धीरे-धीरे उसी शंका, असुरक्षा और घुटन का शिकार हो जाता है।
“जीवन यात्रा” की व्याख्या में कवि लिखता है—“यात्रा कभी नहीं थमती; थम जाती है उम्र”—तो वह जीवन और समय के गहरे सत्य को उद्घाटित करता है। कवि कहता है कि जीवन का स्वभाव ठहराव नहीं, निरंतर प्रवाह है, और जो चलता रहता है वही जीवित कहलाता है, क्योंकि “अनवरत चलना ही जीवन है” और जहाँ रुकावट आती है, वहीं जड़ता जन्म ले लेती है। कवि कहता है कि “रुक जाना जड़ हो जाना है” केवल भौतिक सत्य नहीं, बल्कि चेतना का नियम भी है, क्योंकि चेतन वही है जो गति में है, जो स्वयं को बदलते समय के साथ आगे बढ़ाता है। कवि लिखता है कि जब वह कहता है—“गति का पहिया घूमता है चेतन होने के लिए”—तो वह यह स्पष्ट करता है कि गति ही चेतना का प्रमाण है, स्थिरता नहीं। आगे कवि कहता है—“समय कभी रुक नहीं सकता; यात्रा भी कभी थम नहीं सकती”—और यहाँ वह समय, यात्रा और जीवन को एक ही सूत्र में पिरो देता है, क्योंकि समय का बहना ही यात्रा है और यात्रा का बहना ही जीवन। कवि कहता है कि जीवन वास्तव में रुकता नहीं है, वह तब तक चलता रहता है जब तक “रुक जाती हैं साँसे”, और जैसे ही साँसों का क्रम टूटता है, वही क्षण नश्वरता का संकेत बन जाता है। अंत में कवि कहता है कि “साँसों का टूटना नश्वर होने का संकेत है”, और इस पंक्ति के माध्यम से वह यह स्थापित करता है कि जीवन का अंत यात्रा का अंत नहीं, बल्कि देहगत गति का अंत है, क्योंकि जीवन का सार निरंतर प्रवाह में है, और जो चलता है वही जीवित है, जो थम गया वह केवल स्मृति बनकर रह जाता है।
“तुम कब लौटोगी” में कवि आरंभ करता है—“वसंत दे चुका है दस्तक; लौट आई है गुलशन में रंगत; मौसम आ चुका है प्रेम का; पर तुम नहीं लौटी हो”—तो यहाँ वसंत केवल ऋतु नहीं रह जाता, वह प्रेम, पुनरागमन और जीवन की पूर्णता का प्रतीक बन जाता है। कवि कहता है कि प्रकृति अपने पूरे वैभव के साथ लौट आई है, प्रेम का समय आ चुका है, लेकिन जिस एक उपस्थिति से यह सब सार्थक होना था, वही अनुपस्थित है, और इसी अनुपस्थिति से कविता की पीड़ा जन्म लेती है।
कवि लिखता है—“धूप होने लगी है प्रखर; तुम्हारा रास्ता तकते थक गया”—तो यह प्रतीक्षा केवल आँखों की नहीं, आत्मा की थकान बन जाती है। समय आगे बढ़ रहा है, मौसम बदल रहा है, लेकिन प्रतीक्षित आगमन के “कोई आसार नहीं दिख रहे”, और यही निरंतर प्रतीक्षा प्रेम को विरह में बदल देती है।
कवि कहता है कि आगे प्रकृति का उल्लास और अधिक सघन हो जाता है—“शाख पर लौट आया है किसलय दल; उपवन ने चढ़ा लिये हैं पुष्प मुकुट”—यह सब पुनर्जन्म, सज्जा और स्वागत की तैयारी के प्रतीक हैं। कवि कहता है कि जब वह देखता है—“दरख्तों पर गिलहरियाँ इठलाने लगी हैं; कोयल लौट चुकी है मधुर गीत लिए”—तो उसे प्रकृति की पूर्णता चुभने लगती है, क्योंकि हर प्राणी अपने समय पर लौट आया है। इसी बिंदु पर कवि का आत्मीय प्रश्न उभरता है—“ओ! मेरी कोयल तुम क्यूँ नहीं लौट रहीं!”—जहाँ कोयल प्रेमिका का रूपक बन जाती है और उसका न लौटना पूरे वसंत को अधूरा कर देता है।
कवि कहता है कि—“जब प्रेम का मौसम जा चुका होगा तब लौटने का इरादा है क्या?”—तो यह केवल प्रश्न नहीं, बल्कि समय के हाथ से फिसलते प्रेम की पीड़ा है। कवि कहता है कि “जब शाख के गुलमोहर झड़ जाएँगे” तब लौटने का “अर्थ” ही समाप्त हो जाएगा, क्योंकि प्रेम भी ऋतु-सापेक्ष होता है, उसका समय निकल जाने पर वह केवल पछतावे में बदल जाता है।
कवि कहता है कि—“जेठ की तपती दुपहरी में कैसे लौट पाओगी?”—यहाँ जेठ की दुपहरी जीवन की कठोर परिस्थितियों का संकेत बन जाती है। कवि कहता है कि प्रेमिका को “कोमल” बताकर वह यह स्वीकार करता है कि देर से लौटना उसे असहनीय पीड़ा में डाल देगा, क्योंकि हर प्रेम हर मौसम का भार नहीं सह सकता।
कवि कहता है कि—“मुझे इस बात का अफ़सोस है; तुम नहीं लौटोगी अब”—तो यहाँ प्रतीक्षा टूट जाती है और यथार्थ सामने आ जाता है। “तितलियाँ तो थिरकती हैं; लेकिन गौरैया नहीं फुदकती” कहकर कवि यह भेद रेखांकित करता है कि कुछ प्राणी लौट आते हैं, कुछ लौटकर भी जीवन में स्थायित्व नहीं ला पाते।
अंत में कवि कहता है—“ओ! मेरी गौरैया तुम कब लौटोगी”—यह पुकार अब आशा नहीं, करुण स्मृति बन जाती है। जब वह कहता है—“सूनी पड़ी हैं झोपड़ी की बल्लियाँ; अब कोई नीड़ नहीं बनाता उनकी ओट में”—तो यह खालीपन केवल घर का नहीं, जीवन का हो जाता है। कविता का अंतिम निष्कर्ष अत्यंत मार्मिक है—“लगता है अब न तुम और न गौरैया दोनों कभी नहीं लौटोगी”—यहाँ प्रेमिका और गौरैया दोनों स्थायी अभाव के प्रतीक बन जाते हैं, और पूरी कविता एक ऐसे प्रेम का दस्तावेज़ बन जाती है जो ऋतु के साथ लौट सकता था, लेकिन समय चूक जाने के कारण स्मृति और शून्य में बदल गया।
“सिल्वर रिंग* की व्याख्या में कवि कहता है—“मेरे प्रेमपत्रों का लिफाफा जैसे ही उसके हाथों में पहुँचा; तो प्रेम उमंग के साथ सरपट दौड़ी”—तो यह केवल एक घटना नहीं, प्रेम की उस आकस्मिक उत्तेजना का संकेत है, जिसमें प्रतीक्षा का सारा संयम एक क्षण में टूट जाता है। कवि कहता है कि प्रेमिका का “अपने कमरे में बेड पर धड़ाम से उल्टी गिरना” प्रेम की तीव्रता और अधीरता का प्रतीक है, जहाँ शिष्टता नहीं, केवल भावनाओं का वेग शेष रह जाता है। वह बताता है कि “तकिए पर कुहनियाँ गाड़ के” प्रेमपत्र पढ़ना उस एकांत का संकेत है, जहाँ प्रेम पूरी निष्ठा और तन्मयता के साथ स्वयं को खोलता है।
कवि कहता है कि “एक धैर्यवान कवि” और उसे “अधैर्य प्रेमिका” कहता है, तो यहाँ दो भिन्न स्वभावों का सुंदर द्वंद्व उभरता है—कवि शब्दों में ठहराव रखता है, जबकि प्रेमिका भावनाओं में बह जाती है। कवि कहता है कि “उसकी धमनियों में हुआ तीव्र रक्त प्रवाह” केवल शारीरिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस आंतरिक उथल-पुथल का संकेत है जिसमें प्रेम शरीर और मन दोनों पर अधिकार कर लेता है। वह कहता है कि “भावनाओं का सोता निर्बाध बहने लगा”, यानी प्रेम अब किसी नियंत्रण में नहीं, बल्कि स्वाभाविक और अविरल प्रवाह में है।
कवि कहता है कि—“कितने नाज़ से पहना होगा उसने मेरे तोहफ़े की अँगूठी को”—तो यह अँगूठी केवल चाँदी का आभूषण नहीं रह जाती, बल्कि प्रेम की स्वीकृति, अपनत्व और प्रतिबद्धता का प्रतीक बन जाती है। कवि का यह कहना—“काश! मैं इन हसीन पलों का प्रत्यक्षदर्शी होता!”—उस दूरी और विवशता को उजागर करता है, जिसमें प्रेमी केवल कल्पना के सहारे ही अपने प्रेम की परिणति देख पाता है।
कवि कहता है कि कविता का दूसरा खंड प्रेमिका की आत्मा को और स्पष्ट कर देता है, जब वह प्रत्युत्तर में लिखती है—“मायने नहीं रखती तोहफ़े की कीमत; बस इरादा रूह तक पहुँचने का हो”—यहाँ प्रेमिका भौतिक मूल्य और आत्मिक मूल्य के बीच स्पष्ट रेखा खींच देती है। कवि कहता है कि “क्या हजार का और क्या लाख का?” के माध्यम से वह यह स्थापित करती है कि प्रेम में कीमत नहीं, भावना मापी जाती है।
जब वह लिखती है—“सच्चे दिल की भावनाएँ अनमोल होती हैं”—तो यह प्रेम का दर्शन बन जाता है, जहाँ कोई भी भौतिक वस्तु भावनाओं के समकक्ष नहीं ठहर सकती। और जब वह क्रमशः गिनाती है—“न सोना, न चाँदी, न हीरे-जवाहरात, न नीलम, और तो और पुखराज”—तो यह सूची दरअसल भौतिक संसार की समूची संपदा को नकार कर यह सिद्ध करती है कि प्रेम का मूल्य किसी धातु या रत्न में नहीं, बल्कि दिल की सच्चाई में निहित है।
अंततः कवि कहता है कि सिल्वर रिंग केवल एक उपहार की कथा नहीं, बल्कि उस प्रेम की अभिव्यक्ति है जिसमें साधारण चाँदी की अँगूठी भी तब अनमोल हो जाती है, जब उसे पहनने के पीछे इरादा “रूह तक पहुँचने” का हो, और जहाँ प्रेम की वास्तविक संपदा भावनाओं की निष्कपटता में सुरक्षित रहती है।
“दिल्ली की सैलानी” में कवि लिखता है कि—“एक कवि की प्रेमिका किले की तलहटी में स्थित शाही होटल के दालान में… शाही कुर्सी पर खोई हुई है भावनाओं की तंद्रालस में”, और इस दृश्य के माध्यम से प्रेमिका केवल एक सैलानी नहीं रहती, बल्कि इतिहास, वैभव और प्रेम के संगम में ठहरी हुई एक जीवंत अनुभूति बन जाती है। बिना कंधों वाले टॉप और शाही कुर्सी का संयोग आधुनिक देह-बोध और पारंपरिक स्थापत्य को आमने–सामने खड़ा कर देता है, जहाँ वर्तमान अपनी सहजता के साथ अतीत की भव्यता में विश्राम कर रहा है, और यही विरोधाभास दृश्य को सौंदर्य और गहराई प्रदान करता है।
कवि लिखता है कि—“मुझे बड़ी कोफ़्त हो रही है कि कोई थपक कर खलल न डाल दें”, और यहाँ प्रेमी की वह स्वाभाविक चिंता उभरती है जो प्रेमिका के एकांत को सुरक्षित रखना चाहती है। “श्रांत सैलानी” का प्रयोग इस बात को स्पष्ट करता है कि यह थकान केवल शरीर की नहीं, बल्कि यात्राओं, अनुभवों और देखे गए संसार की भी है, इसलिए उसका एकांत साधारण नहीं, लगभग पवित्र हो जाता है। “सैर-सपाटे से क्लांत लौटी है” लिखकर कवि प्रेमिका को विश्राम का अधिकार देता है, जहाँ प्रेम बोलने से पहले मौन को समझता है।
कवि लिखता है कि—“इसके शहर में आने से आज दिलकुशा बयार बह रही फ़िज़ाओं में”, और प्रेमिका की उपस्थिति पूरे वातावरण को परिवर्तित कर देती है। यह परिवर्तन केवल मौसम का नहीं, बल्कि प्रेम के आगमन से जीवन में उपजी उस ताजगी का संकेत है जो हवा तक में घुल जाती है। इसी प्रवाह में कवि इतिहास से वर्तमान को जोड़ता है और संकेत करता है कि शायद इसी प्रेम-बोध के कारण “मेवाड़ के एक राजा ने चार सौ साल पहले… ‘दिलखुश महल’ बनवाया हो”, जहाँ प्रेम काल की सीमाओं को लाँघकर स्थापत्य और स्मृति में रूपाकार ले लेता है।
कवि लिखता है कि—“जहान को प्रेम का पैग़ाम देने” की भावना के माध्यम से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रेम केवल निजी अनुभूति नहीं, बल्कि सभ्यता, इतिहास और निर्माण को दिशा देने वाली शक्ति है। इस प्रकार दिल्ली की सैलानी, शाही होटल, किला, दिलखुश महल और बहती बयार—सब एक ही प्रवाह में यह सत्य उद्घाटित करते हैं कि जब प्रेम किसी स्थान पर ठहरता है, तो वह अतीत और वर्तमान को जोड़कर भावनाओं की एक सतत यात्रा रच देता है, और यही इस कविता की आत्मा है।
*झील सी आँखें तुम्हारी” की प्रवाहमान व्याख्या में कवि लिखता है कि—“तुमने झील के साहिल पर बैठ झील सरीखी आँखों से मेरा दीदार किया”, और इसी क्षण में प्रेम और सौंदर्य का एक ऐसा अनुभव जन्म लेता है जो जीवन का अनमोल पल बन जाता है। यहाँ झील केवल एक प्राकृतिक दृश्य नहीं, बल्कि प्रेमिका की आँखों की गहराई, स्थिरता और आकर्षण का प्रतीक बन जाती है, जिसमें कवि अपनी आत्मा की परछाई देख पाता है।
कवि लिखता है कि—“रजत से चमकते हुए नीर को तुम्हारे कर कमलों के स्पर्श ने शीतल कर दिया है”, और इस पंक्ति में प्रेमिका की उपस्थिति और स्पर्श का प्रभाव न केवल भावनात्मक है, बल्कि प्रकृति पर भी पड़ता है। यह दर्शाता है कि प्रेम और स्नेह की शक्ति इतनी गहन होती है कि वह भौतिक संसार को भी शांति और सौंदर्य प्रदान कर देता है।
कवि लिखता है—“झंझावातों का एक झोंका आया है जो कह कर गया है कि प्रेम की नौका पर सवार जोड़ों पर नहीं चलता; मेरा वश कि उलट दूँ उनकी भावनाओं की नैय्या”—यहाँ कवि यह बताता है कि प्रेम का अनुभव केवल रोमांस या सौंदर्य तक सीमित नहीं रह जाता, वह साहस और शक्ति भी प्रदान करता है। वह यह दिखाता है कि प्रेमी के भीतर इतनी सामर्थ्य है कि वह कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियों में भी प्रेम की नौका को सुरक्षित रख सकता है।
कवि लिखता है कि—“जब तुम सुर्खाब की अठखेलियों में मशगूल थी; तब मैंने चुपके से कैमरे में उतारे थे यादृच्छिक चित्र”, और इसी क्रिया में वह प्रेम का सजीव दस्तावेज तैयार करता है। वह कहता है कि इन चित्रों को लेने के क्षण में “घड़ी ठिठक गई”, और कवि को ऐसा लगता है कि उसने यही पल वर्षों से इंतज़ार किया था। यहाँ समय केवल भौतिक नहीं रह जाता, वह प्रेम की दृष्टि में स्थिर हो जाता है और अनुभव का हिस्सा बन जाता है।
कवि लिखता है—“वैसे तो समय को भला कौन रोक पाया है? लेकिन मेरी अंतरंग प्रेम दृष्टि देख घड़ी की सुई भी अपना होश खो बैठी”—इस पंक्ति में वह प्रेम की गहनता और उसकी शक्ति को दर्शाता है, कि प्रेम इतना प्रभावशाली है कि समय भी उसके सम्मोहित होने से थम जाता है।
अंत में कवि लिखता है—“ओ! मेरे झील-नाविकों आने वाले पर्यटकों से कहना कि एक कवि ने प्रेम में रहते हुए समय के पहिए को भी रुकने पर मजबूर कर दिया था।” यहाँ वह अपनी प्रेम की अनुभूति को व्यापक प्रतीक में बदल देता है, जहाँ झील, प्रेमिका की आँखें, कैमरे में उतारे चित्र और समय की स्थिरता—सब मिलकर यह उद्घाटित करते हैं कि सच्चा प्रेम केवल भावनाओं का नहीं, बल्कि अनुभव और इतिहास बनाने की शक्ति भी रखता है।
“न्याय के बंद पट” में कवि लिखता है कि—“सुनो पुरुषों! तुमने किसी की सहमति के बिना किसी की अस्मिता पर हाथ कैसे डाला? फिर बताओ तुम पुरुषार्थी कैसे हुए?” यह उद्घोष केवल आरोप नहीं, बल्कि उस सामाजिक वास्तविकता का कटाक्ष है जहाँ पुरुष पितृसत्ता के नाम पर स्त्री की स्वतंत्रता और सम्मान का हनन करते आए हैं। कवि लिखता है कि यह केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संरचना का परिणाम है, क्योंकि “हम जानती हैं तुम्हें हजारों वर्षों से देखती आ रही हैं; तुम इसके लिए भी कोई न कोई प्रतिमान गढ़ लोगे।” यहाँ यह स्पष्ट होता है कि पुरुष अपने कुत्सित अधिकारों को स्वीकृति और परंपरा के नाम पर न्यायोचित ठहराते आए हैं।
कवि लिखता है—“लेकिन अब पानी सिर से निकल गया है; तुम्हारे तर्कों और प्रतिमानों की धज्जियाँ उड़ाने का समय आ गया है”—यहाँ दृढ़ चेतावनी दी जाती है कि अब बहिष्कार या शिकायतें पर्याप्त नहीं; समय क्रांति का है। कवि लिखता है—“सुनो पुरुषों! ये वरदान नहीं; पशुता से भी बदतर है”—यह स्पष्ट करती है कि जिस शक्ति और प्रभुत्व को पुरुष वरदान समझते हैं, वह वास्तव में दमन और हिंसा का प्रतीक बन चुका है। “अब नहीं रहे तुम्हारे भीतर कृष्ण जो आते थे स्त्री की अस्मिता बचाने”—यह पंक्ति पौराणिक आदर्श और वर्तमान वास्तविकता के विरोधाभास को उजागर करती है।
कवि लिखता है—“हर रोज हर गली-मोहल्ले में स्त्री की अस्मिता को रौंदा जा रहा है; रोज के अखबारों में रौंदी हुई अस्मिता भरी पड़ी है”—यह पंक्ति दैनिक जीवन की त्रासदी को सामने लाती है। “जब यह सड़कों पर आ जाए तब ही इसको ‘बलात्कार’ कहा जाता है”—यह दर्शाता है कि कानूनी और सामाजिक मान्यताएँ पीड़िता के अनुभव की वास्तविकता से अक्सर दूर रहती हैं।
कवि लिखता है—“न्याय का गला घोंट दिया गया है; सड़कों पर मोमबत्तियाँ जलाकर पाँच-दस दिन तक प्रदर्शन कर बस हाथ कुछ नहीं लगता”—यह न्याय व्यवस्था की अक्षमता और प्रतीकात्मक प्रदर्शन की सीमाओं को उजागर करती है। कवि लिखता है—“लाँघनी होगी अब पितृसत्ता की देहरी”—यह स्पष्ट चेतावनी है कि केवल प्रतीकात्मक विरोध नहीं, बल्कि संगठित और सक्रिय क्रांति की आवश्यकता है।
कवि लिखता है—“‘चूड़ियाँ पहने हाथ’ ही हमारी क्रांति के प्रतीक हैं”—यह पंक्ति स्त्रियों की शक्ति और एकता का प्रतीक बन जाती है। चूड़ी, जो परंपरागत रूप से सौंदर्य और शक्ति का प्रतीक होती है, उसे अब प्रतिरोध और न्याय की शक्ति का प्रतीक बनाया गया है। कवि लिखता है—“दुनिया की स्त्रियों एक हो जाओ; ये ‘चूड़ी पहने हाथ’ पुरुषार्थ के विध्वंसक होंगे”—यह समग्र आह्वान है कि पितृसत्ता के पापों का घड़ा अब तोड़ना ही होगा, तभी समाज में न्याय स्थापित होगा।
अंत में कवि लिखता है—“तब ही कायम होगी जवाबदेहिता; तब ही खुलेंगे न्याय के बंद पट”—यह उद्घोष करता है कि केवल प्रदर्शन या शब्द पर्याप्त नहीं, क्रांति, एकता और प्रतिरोध ही न्याय की वास्तविक बहाली कर सकते हैं। इस प्रकार यह कविता स्त्री की अस्मिता, पितृसत्ता का दमन, और न्याय की स्थापना के बीच के संघर्ष को पूरी तीव्रता और आवेश के साथ उद्घाटित करती है।
“हवाई जहाज की उड़ान” की प्रवाहमान व्याख्या में कवि लिखता है कि—“हवाई जहाज ने जैसे ही उड़ान भरी तो लगा किसी घाटी से कोई बस पलटने वाली है”—यह दृश्य हवाई यात्रा के शुरुआती क्षणों की तीव्रता और भय का प्रतीक है। कवि अपनी संवेदनशील दृष्टि से इस अनुभव को जीवन के अनिश्चित क्षणों से जोड़ता है, जहाँ अचानक गति और ऊँचाई का अहसास भय और रोमांच दोनों पैदा करता है।
कवि लिखता है कि—“फिर हवाई जहाज पक्षी-सा प्रतीत हुआ जैसे गरुड़ की तरह डैने फैलाए उड़ रहा हो”—यह तुलना उड़ान की स्वतंत्रता, शक्ति और ऊँचाई का प्रतीक है। हवाई जहाज अब केवल यंत्र नहीं रह जाता, वह गरुड़ की तरह आकाश में शान और प्रभुत्व के साथ विचरण करने वाला जीव बन जाता है, जो मानवीय कल्पना और तकनीकी साधन का अद्भुत मिश्रण है।
कवि लिखता है—“खिड़की से बाहर दृष्टि डाली तो देखा टिमटिमाती प्रकाश बत्तियाँ दुनिया का सबसे बड़ा दीपोत्सव मना रही हो”—यह दृश्य असीम सौंदर्य और मानव जीवन की विविधता का संकेत है। कवि कहता है कि पृथ्वी पर फैली रोशनी, जैसे छोटे-छोटे दीपक, एक संपूर्ण उत्सव का रूप ले लेती हैं, और हवाई दृष्टि से यह दृश्य मानो मानवीय जीवन की महिमा और ऊर्जा का प्रतीक बन जाता है।
कवि लिखता है—“जब सड़कों को देखा तो लगा छोटी-छोटी पगडंडियों पर चीटियाँ घूम रही हैं”—यह दृश्य मानवीय जीवन की सूक्ष्मता और असंख्य गतिविधियों का प्रतीक है। उच्च दृष्टिकोण से जीवन और शहर छोटे जीव-जंतुओं की तरह प्रतीत होते हैं, और कवि इस दृष्टि से दूरी और समीक्षात्मक प्रेम दोनों व्यक्त करता है।
कवि लिखता है—“जब लैंड हो रहे थे तो लगा कि कोई राह से भटका पक्षी अपने नीड़ की तरफ लौट आया है”—यह उड़ान का समापन और स्थिरता का प्रतीक है। कवि यह अनुभव साझा करता है कि यात्रा की अनिश्चितता और रोमांच के बाद सुरक्षित लैंडिंग का अहसास, मानवीय मन को घर की शांति और आत्मिक संतोष की अनुभूति देता है।
इस प्रकार, हवाई जहाज की उड़ान केवल भौतिक यात्रा नहीं, बल्कि दृष्टि, कल्पना और अनुभव की यात्रा बन जाती है, जिसमें कवि मानवीय जीवन, प्रकृति, तकनीक और अंतरंग भावनाओं को एक ही प्रवाह में जोड़ देता है।
“प्रेम का अहसास” में कवि लिखता है कि—“सरसों के पीले फूलों बीच चूमते ही तेरे होठों के पाटल मेरे मिट्टी के मन में नवांकुर फूट पड़े; मेरे पुष्प रूपी तन में कलियाँ खिल गई”—यह पंक्ति प्रेम की वह सहज अनुभूति उद्घाटित करती है जिसमें बाहरी दृश्य और भीतर की भावनाएँ एक साथ खिल उठती हैं। कवि लिखता है कि प्रेमिका के स्पर्श से उसके मन और तन में जीवन का नवस्फूर्ति प्रवाहित हो जाता है, मानो प्रकृति और भावनाएँ आपस में मिलकर एक नई चेतना का संचार कर रही हों।
कवि लिखता है कि—“जब तुमने आँखों में आँखें डाली तो लगा मावठ आ गई; आसमान में घनघोर घटा छा गई”—यह दृश्य प्रेम की तीव्रता और मनोभाव की घनत्व को प्रकृति के चक्रों से तुलना करके व्यक्त करता है। जैसे वर्षा की बूँदें मिट्टी को सींचकर सौंधी खुशबू फैलाती हैं, वैसे ही प्रेमिका की दृष्टि कवि के भीतर गहन संवेदनाओं को जगाती है। कवि लिखता है—“बारिश की बूँदों ने मिट्टी को चूमा तो धरती के आँचल से मिट्टी की सौंधी खुशबू समूचे वातावरण में पसर गई”—यह प्रेम और प्रकृति के बीच अनोखी सामंजस्यपूर्ण कृति को उद्घाटित करता है।
कवि लिखता है—“मुझे आलिंगन में लेकर तुम्हारे बाहुपाशों ने मदहोश कर दिया; आलिंगन के इस प्रथम स्पर्श से मेघों में तड़ित धारा प्रवाहित हो गई”—यह पंक्ति प्रेम के शारीरिक और मानसिक स्पर्श की शक्ति को प्रकृति के महाकाय प्रभावों के समान दर्शाती है। प्रेमिका का आलिंगन केवल भावनाओं का संचार नहीं, बल्कि पूरे अंतरमन और समूचे वातावरण को झकझोर देने वाला अनुभव बन जाता है। कवि लिखता है—“मेरे उल्लसित अंतर्मन में इंद्रधनुष के अर्धवृत्त ने रंगों की बौछार कर दी”—यह प्रेम की अनुभूति में आनंद, उत्साह और विविध रंगों का प्रतीक है, जिसे कवि जीवनपर्यंत स्मृति में सुरक्षित रखना चाहता है।
कवि लिखता है—“मेरे कंधे पर तुम्हारा सिर किसी झोपड़ी की थूणी पर बड़ींडे जैसा सा था; मैं थूणी था और तुम बड़ींडा”—यह रूपक प्रेम के स्नेह, सहारा और विश्वास को प्रतीकात्मक रूप में दर्शाता है। कवि लिखता है कि प्रेमिका का प्रश्न—“क्या दे पाओगे मुझे सहारा जीवन भर?”—और उसका स्वयं का उत्तर, थूणी की भूमिका की तरह है, जो बड़ींडे को जीवनभर सुरक्षित रखती है। यहाँ प्रेम केवल आकर्षण या भावनाओं का नहीं, बल्कि विश्वास, सुरक्षा और आत्मीयता का प्रतीक बन जाता है।
इस प्रकार, प्रेम का अहसास कविता में कवि का संवेदनशील मन, प्रेमिका के स्नेह और प्रकृति की सामंजस्यपूर्ण छवियाँ एक साथ प्रवाहित होकर प्रेम के अनुभव को सम्पूर्णता और गहनता प्रदान करती हैं।
“काश! वे पढ़े-लिखे होते” में एक करुणा है, और यह करुणा उस अलसाए हुए व्यक्ति की है जो कुर्सी पर बहुत आराम तलब है। अजीब विडंबना है; इस देश के ब्राह्मणों की तर्ज पर आज पढ़ा लिखा आदिवासी दलित मुहावरे की उपजाति पूछता है और उन मछुवारों से अपनी जाति भी बताता है। वह संभ्रांत आदिवासी मछुवारों से अपनी जाति बताकर, शायद, उनसे सहानुभूति लेना चाहता है क्योंकि मछुवारों के ध्यान न देने पर न वह कुछ शिक्षा देता है और न ही उन्हें कोई सहायता के आश्वासन की बात करता है। यहां अदृश्य वर्ग विभाजन साफ दिखाई देता है। यह कविता केवल अशिक्षा के शोक तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह पढ़े-लिखे होने की निष्फलता पर कठोर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। कविता में झील, नाव और मछली पकड़ते आदिवासी अब मासूम अभाव के प्रतीक नहीं रह जाते, बल्कि वे उस बुनियादी सच को उजागर करते हैं कि शिक्षा अपने-आप में मुक्ति नहीं है, यदि वह संघर्ष, साहस और वैचारिक प्रतिबद्धता से रहित हो।
कवि जब यह सोचकर दुखी होता है कि “वे भी पढ़े-लिखे होते और जान पाते अपने अधिकारों को”, तो आज के संदर्भ में यह पंक्ति उलटकर हमारे सामने खड़ी हो जाती है—क्या आज के पढ़े-लिखे दलित और आदिवासी सचमुच अपने अधिकारों को जान और बचा पा रहे हैं। यहाँ कविता की करुणा एक आरोप में बदल जाती है, क्योंकि तथ्य यह है कि पढ़े-लिखे दलितों की उपस्थिति के बावजूद आरक्षण छीना गया, संविधान में 117 संशोधन हुए, और वह सामाजिक-आर्थिक दृष्टि, जिसे डॉ. आंबेडकर ने चेतना के केंद्र में रखा था—भूमि सुधार, कृषि का पुनर्गठन, बीमा, बैंक और उद्योगों का राष्ट्रीयकरण, संपत्ति का निजी हाथों से विलग किया जाना—वह सब चुपचाप दरकिनार कर दिया गया। कविता का दुख अब अशिक्षा से आगे बढ़कर उस शिक्षित वर्ग की बौद्धिक कायरता पर टिक जाता है, जिसने सत्ता की मेज पर कुर्सी तो पाई, लेकिन व्यवस्था की नींव को छूने का साहस नहीं किया। “संसद”, “विश्वविद्यालय” और “जिला” जैसे शब्द अब उपलब्धि के नहीं, बल्कि आत्मसंतोष के प्रतीक बन जाते हैं, जहाँ पहुँचकर भी लड़ाई नहीं लड़ी गई।
दलित दृष्टि से यह कविता अब यह सवाल करती है कि यदि पढ़ा-लिखा होना केवल व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित रह जाए और सामूहिक संपत्ति, संसाधनों और सत्ता-संरचनाओं पर प्रश्न न उठाए, तो वह शिक्षा भी एक प्रकार की अशिक्षा ही है। नाव का आँखों से ओझल होना अब केवल उन आदिवासियों का नहीं, बल्कि उस अवसर का लुप्त हो जाना है जहाँ पढ़े-लिखे दलित-आदिवासी एक निर्णायक ऐतिहासिक हस्तक्षेप कर सकते थे। अंत में गूंजता वाक्य “काश! वे पढ़े-लिखे होते” अब एक व्यंग्यात्मक प्रतिध्वनि में बदल जाता है—मानो कविता स्वयं पूछ रही हो कि पढ़े-लिखे होकर भी यदि हिम्मत, दृष्टि और संघर्ष नहीं है, तो फिर यह शिक्षा किस काम की। यह समीक्षा कविता को करुणा से निकालकर आत्मालोचना के कठोर लेकिन जरूरी धरातल पर स्थापित कर देती है। मुझे भी कविता लिखना हो तो मैं इसको इस तरह लिखता:
काश! ये पढ़े-लिखे लोग लड़े होते
झील के किनारे बैठा मैं
अब केवल मछुवारों को नहीं देखता;
मैं उन कुर्सियों पर बैठे
एलएसए पढ़े-लिखे चेहरों को भी देखता हूँ;
जिन्होंने किताबें तो पढ़ीं;
पर इतिहास से आँख नहीं मिलाई;
वे जो नाव में थे;
मछलियाँ पकड़ रहे थे;
उनके पास सवाल नहीं थे;
यह दुख है;
पर उससे बड़ा दुख यह है;
कि जिनके पास सवाल हैं;
वे सवाल उठाते नहीं;
डॉ. आंबेडकर ने कहा था—
भूमि बिना न्याय के;
शिक्षा बिना अर्थ के;
और संपत्ति बिना समानता के
केवल नए शासक पैदा करती है;
पर पढ़े-लिखे दलितों ने
इन वाक्यों को उद्धरण बना दिया;
हथियार नहीं;
आरक्षण गया;
संविधान बदला;
संसद चुप रही;
विश्वविद्यालय सुरक्षित रहे;
जिलों में फाइलें चलती रहीं;
और संघर्ष
फुटनोट बनता गया;
जो पढ़े-लिखे थे;
वे कुर्सियों पर अलसाए बैठे हैं;
जो अनपढ़ हैं;
वे नाव खेते रहे;
और बीच में
एक पूरी क्रांति
डूबती चली गई;
अब मैं यह नहीं कहता
कि काश! वे पढ़े-लिखे होते;
अब मैं यह कहता हूँ—
काश! पढ़कर
लड़ने की हिम्मत भी होती;
क्योंकि शिक्षा
यदि सवाल न करे;
तो वह भी
शोषण की भाषा ही बन जाती है;
जब नाव ओझल होती है;
तो सिर्फ झील नहीं खाली होती;
एक संभावना
फिर से
इतिहास में
डूब जाती है।
—डॉ. आर डी आनंद
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