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एडवोकेट मुर्तजा हुसैन की जबानी--- भारत की न्याय प्रणाली की खूबियाँ और खामियाँ

संपादकीय टीम 22 जनवरी 2026 को 08:51 am बजे
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भारत की न्याय प्रणाली न्याय प्रणाली पर चर्चा करने से पहले भारत में प्राचीन काल में जो न्याय व्यवस्था थी उसे जानने की भी जिज्ञासा होती है। 15 अगस्त 1947 से पहले भारत एक विशाल भौगोलिक क्षेत्र था जिसमें पाकिस्तान बांगला देश भी थे। मुगल काल में भी एक बड़ा भौगोलिक क्षेत्र था, सल्तनत काल में भी एक भूभाग था। 12वीं शताब्दी से पहले हिन्दू राजाओं के राज्य और साम्राज्य थे। सल्तनत काल से पहले अलग अलग राजाओं का अलग अलग भूभागों पर आधिपत्य था जिस पर वे लोग अपना शासन करते थे। उस समय जो न्याय व्यवस्था थी वह शास्त्रों और विद्वानों द्वारा निर्धारित किये गये नियमों के अनुसार थी और राजा इसके सर्वोच्च शिखर पर था जिसका निर्णय अन्तिम था। सल्तनत काल में मुस्लिम सुल्तानों ने इस्लामी न्याय शास्त्र को लागू किया और काजी की अध्यक्षता में न्यायालय गठित किये जो कुरान, हदीस और इस्लामिक न्यायविदों द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों की रोशनी में फैसले करते थे कुछ विषयों पर लेकिन स्थानीय हिन्दू विवादों पर हिन्दू धर्मशास्त्रों में वर्णित नियम लागू होते थे जिसके लिये मदद करने वाले विद्वान होते थे। मुगल काल में शासन में हिन्दू पदाधिकारी बहुत बड़ी संख्या में थे विभिन्न पदों पर।

1757 के बाद मुगल साम्राज्य कमजोर हो गया और ईस्ट इंडिया कम्पनी ने काफी भूभाग अपने नियन्त्रण में ले लिया था जिन्होंने ब्रिटिश पैटर्न पर कोर्टस बनाये जो वर्तमान न्याय व्यवस्था का आधार हैं। दिल्ली पर 1803 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने मराठों को हराकर कब्जा कर लिया। उस समय मुगल बादशाह (Later Mughals कहते हैं) मराठों के गठजोड़ से राज करते थे या मराठे राज करते थे लेकिन सिक्का मुगल बादशाहों का चलता था। उस समय दिल्ली में काजी के नियन्त्रण में अदालत भी थी जिसमें मुस्लिम कानून और हिन्दू कानून के मुताबिक फैसले होते थे। 1803 के बाद जो न्यायिक व्यवस्था लागू हुई जिसमें Civil Courts और Criminal Courts थे जो आज तक चल रही है जिसमें Small Causes Court (जज खलीफा या लघु न्याय वाद), दीवानी न्यायालय, फौजदारी न्यायालय थे जो British Jurisprudence को आधार मानकर काम करते थे। 1857 की क्रांति और उसके दमन के बाद भारत England के King के Empire की Dominion बन गया और British Parliament ने भारत के लिये कई दर्जन कानून बनाये जिसमें Indian Penal Code 1860, Criminal Procedure Code

Indian Evidence Act, Registration Act वगैरह है जो आज तक चल रहे हैं थोड़े बहुत Modification के साथ। 1947 में देश आजाद हो गया और विभाजित भी हो गया। लेकिन यही कानून भारत और पाकिस्तान के कोर्ट में चलने लगे और वे न्यायालय Continue रहे और आज तक हैं। आज भारत की न्याय व्यवस्था बहुत बड़े संकट में है। आबादी बहुत अधिक है और न्यायाधीश उस अनुपात में बहुत कम। मुकदमों के निर्णय में बहुत समय लगता है जो व्यवहारिक रूप से सही नहीं। जिला न्यायालय में कई साल लगते हैं केस को फैसला तक पहुँचने में। फिर जिला स्तर पर ही अपील होती है उसे भी कई साल लगते हैं फिर उच्च न्यायालय में लगभग Average 20 साल, 25 साल या 30 साल में नम्बर आता है। जब नम्बर आता है तब तक पक्षकार मर जाते हैं जिससे Criminal Case Abate (मृत) हो जाते हैं और Civil Case में पक्षकार के वारिसान या उत्तराधिकारी उसका स्थान ग्रहण करते हैं। Service Matters में देरी के कारण अगर पक्षकार की आयु Retirement तक पहुँच गयी तो उसको नौकरी पर बहाल नहीं किया जा सकता।

और कुछ रुपये दिये जा सकते हैं। अगर समय रहते फैसला नहीं आता फौजदारी केस में तो जो जेल में कैदी है उसके मौलिक अधिकार का हनन होता है और सजा न हो दोषी को तो Victim के अधिकार का हनन होता है। लोग जो ठीक से न्याय व्यवस्था समझते हैं उनका भी विश्वास डगमगा रहा है। सिद्धान्त में भारत की न्याय व्यवस्था उत्कृष्ट और उच्च कोटि की है लेकिन व्यवहार में बिल्कुल ही गैर जिम्मेदार और भ्रष्टाचार में लिप्त। उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में हजारों मुकदमे लम्बित हैं और किसी को परवाह नहीं। जज लोग सोशल गैदरिंग में दिखाई दे रहे हैं जबकि कोर्ट में होना चाहिये। कार्यपालिका (Executive) के लोगों को ठीक से पता भी नहीं है कि न्याय प्रणाली को कैसे सुधार (Reform) की जरूरत है। यह बहुत बड़ा विषय है इस पर जितना भी विमर्श करें कम ही होगा। सभ्य समाज (Civil Society) जब तक पहल नहीं करेगी इस समस्या का निदान नहीं होगा।

संपर्कः 98103 57561

Murtaza Husain Advocate, Delhi