हम, हमारी भाषा और हमारा राष्ट्रवाद

जंगल में शिकारी गया था तीतर मारने! उसने तीतर मारा ही और उसके हाथ बटेर भी लग गया। अरबी-फारसी की खिचड़ी में इसे ही कहा गया है हिम्मत-ए-मर्दा, मदद-ए-खुदा!
आपके वाक्यों में अरबी-फारसी के शब्दों का बाहुल्य होना कभी इस देश में आपके कुलीन होने की निशानी थी। अब ऐसे शब्द सुनते ही देशद्रोही मान लेने का फैशन है।
आजकल अंग्रेजी शब्दों के बाहुल्य वाली भाषा फैशन में है। जिन लोगों के पूर्वजों ने अंग्रेजों की खूब पेंशन खाई, वे आपके मुंह से निकलने वाले हर अंग्रेजी शब्द से आपकी कुलीनता तोलते हैं।
शशि थरूर सिर्फ अपने भारी भरकम अंग्रेजी की वजह से ही विपक्ष में रहकर भी सरकार की नजर में सबसे बड़ा कुलीन है, वर्ना या तो जेल में होता या फिर भाजपा में।
आज से छह सौ साल पहले तक बाल्टिक स्लैंग वाली संस्कृत कुलीनों की भाषा थी। तब उसके आगे स्थानीय भाषाएं महज पानी भरती थीं। संस्कृत मुट्ठी भर लोग ही जानते और बोलते थे। मगर उनका जलवा बहुत था। सत्ता उनका पानी भरती थी। बड़े बड़े शासक अपने लौंडों को बाल्टिक स्लैंग सीखने के लिए छोटे हुए गुरुओं के पास भेजते थे।
डेमोक्रेसी के दौर में राजा और राजकुमार कहना अपमानजनक लगता है, इसलिए राजकुमार की जगह शासक का लौंडा ही मुझे सही शब्द लगा। विद्वजन इसके लिए बेहतर शब्द भी सुझा सकते हैं। भाषा के नाम पर मेरे समान दरिद्र कम ही लोग होते हैं।
हमें सिर्फ वस्तुएं आयात करने का ही शौक नहीं है। हम सदियों से भाषा भी आयात कर रहे हैं। हमारे पास अपनी भाषा बची ही नहीं है। वह सिंधु-सरस्वती लिपी की तरह ही लुप्त हो गई है। उसे ढूंढना कभी हमने चाहा ही नहीं ।
हमने कभी बाल्टिक तो कभी अरबी-फारसी स्लैंग को ही अपनी भाषा मान लिया, क्योंकि शासक ने उसे मान लिया था। पाली और ब्रह्मी के दौर में भी मिश्रण बनते रहे।
इसलिए यूरोप के सभी भाषा विद्वान बेहिचक हमारी सभी भाषाओं को इंडो-यूरोपीयन भाषा परिवार में रखते हैं।
पश्चिमी विद्वान हमारे संस्कृत के मातृ शब्द को जर्मन के मुटर से जोड़कर और बहन के लिए संस्कृत के स्वसा और सहोदरा को जर्मन भाषा के श्वेस्टर से जोड़कर, सब भाषाओं की मां-बहन एक कर देते हैं। उसके बाद पितृ को व्फाटर से जोड़कर परिवार एक होने का दावा ठोक देते हैं।
यह जो घरों में बच्चे बाप को 'पापा' या 'पापी' बोलते हैं, ये दोनों भी जर्मन स्लैंग हैं।
पहले पश्चिम के विद्वान सिर्फ भाषा के बूते पर इंडो-यूरोपीयन परिवार की कहानी गढ़ते थे। अब जब से उन्हें नींडरथल का डीएनए और जीनोम विश्लेषण मिल गया है। उन तीतर मारने वालों के हाथ बटेर भी लग गई है।
दूसरी ओर हमारा सारा राष्ट्रवाद अपनी मूल लिपी और मूल भाषा को खोजने के लिए बिल्कुल व्याकुल नहीं है। वह अपने ही देश के धर्म परिवर्तन करने वालों को विदेशी साबित करने पर तुला है।
इब्राहिम की संतानें मनु की संतानों की भाषा, धर्म और संस्कृति चुरा चुकी हैं। इससे पहले कि वे हमें पूरी तरह आयातित साबित कर दें। पूंजीपतियों के साथ मिलकर हमारे जंगलों और आदिवासियों की संस्कृति को पूरी तरह नष्ट कर दें। हमारे विश्वविद्यालयों के भाषा विभागों को अपने रिसर्चर और स्कॉलर आदिवासियों के बीच भेजकर अपनी खोई भाषा और लिपी को ढूंढने का अंतिम प्रयास अवश्य करना चाहिए। इससे पहले कि उसे पूरी तरह लुप्त कर दिया जाए।
यह प्रयास संस्कृत, अरबी, फारसी के पूर्वाग्रह से मुक्त होना चाहिए, क्योंकि ये सभी भाषाएं इंडो-यूरोपीयन परिवार की साबित की जा चुकी हैं। यूरोप से अलग निस्संदेह हमारी पहचान होगी, जो आज भी कहीं असंक्रमित कौने में संरक्षित होगी। जैसे सिंधु लिपी के रूप में संरक्षित है बे-आवाज। उसके स्वर को वापस लाने का काम भी अगर यूरोपीयन के भरोसे छोड़कर बैठे रहेंगे तो फिर काहे का राष्ट्रवाद। #सुधीर_राघव