नामवर सिंह की भाषा सबसे ज़्यादा रामचन्द्र शुक्ल से प्रभावित है: अवधेश प्रधान

अंकित कुमार मौर्य, शोधार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
अंकित कुमार मौर्य, साहित्य संवाददाता
वाराणसीः काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा प्रो. नामवर सिंह की जन्मशती के अवसर पर ‘नामवर सिंह : आलोचना और वैचारिकता’ विषयक त्रि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन कला संकाय के प्रेमचंद सभागार में किया जा रहा है।







संगोष्ठी के ‘आधुनिक कविता और मुक्तिबोध’ विषयक पाँचवें सत्र में हिन्दी विभाग के आचार्य कृष्णमोहन सिंह ने ‘मुक्तिबोध का मूल्यांकन और नामवर सिंह’ विषय पर वक्तव्य देते हुए कहा कि नामवर जी की आलोचना का विकास एक प्रक्रिया के तहत गुणात्मक परिवर्तन में परिणत होता है। उन्होंने कहा कि प्रेम के प्रति ईमानदार होना कठिन है, किंतु घृणा के प्रति ईमानदार होना उससे भी अधिक कठिन है। इस संदर्भ में नामवर जी का मत था कि मुक्तिबोध ने उचित समय पर अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही थी।
लखनऊ विश्वविद्यालय से आए प्रो. अनिल त्रिपाठी ने ‘नयी कविता का मूल्यांकन और नामवर सिंह’ विषय पर कहा कि पाठ-केंद्रित आलोचना नामवर जी की आलोचना का बुनियादी पक्ष है। प्रारंभिक प्रगतिशील आलोचना यांत्रिक स्वरूप की थी, जिसे नामवर जी ने अपनी आलोचना के माध्यम से तोड़ने का प्रयास किया। वे नयी कविता की विविध शब्दावलियों के भीतर गहराई से उतरते हैं।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. बसन्त त्रिपाठी ने ‘प्रगतिशील कविता का मूल्यांकन और नामवर सिंह’ विषय पर कहा कि प्रगतिशील कविता से नामवर जी के आलोचनात्मक मानस का विकास हुआ। उन्होंने प्रकृति, लोक, भाषा और प्रेम को प्रगतिशील कविता की आलोचना के प्रमुख आधारों के रूप में स्थापित किया। नागार्जुन को वे आधुनिक हिन्दी कविता का सबसे बड़ा जनकवि मानते थे।
सागर विश्वविद्यालय से आए डॉ. मिथिलेश शरण चौबे ने ‘अंधेरे में’ का नामवर-विवेचन विषय पर कहा कि नामवर जी का मानना था कि ‘अंधेरे में’ का ‘मैं’ और ‘रक्तस्नात पुरुष’ स्वयं मुक्तिबोध नहीं हैं। मुक्तिबोध ने शब्द और कर्म—दोनों स्तरों पर अभिव्यक्ति के खतरे उठाने की बात कही थी। इस सत्र का संचालन डॉ. विवेक सिंह ने किया।
‘हिन्दी आलोचना का मूल्यांकन’ विषयक छठे सत्र में ‘नामवर सिंह के रामचन्द्र शुक्ल’ विषय पर अपनी बात रखते हुए हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं आचार्य अवधेश प्रधान ने कहा कि रामचन्द्र शुक्ल नामवर सिंह के लिए आलोचना के मानदंड थे। बी.ए. तृतीय वर्ष में ही नामवर जी ने रामचन्द्र शुक्ल पर लेख लिखा था। उन्होंने कहा कि नामवर सिंह की भाषा सबसे ज़्यादा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से प्रभावित है—वही कसावट, वही निश्चितार्थता और वही निगूढ़ता।
प्रो. सियाराम शर्मा ने ‘रामविलास शर्मा का मूल्यांकन और नामवर सिंह’ विषय पर कहा कि हिन्दी आलोचना का विकास नामवर सिंह और रामविलास शर्मा के बीच वाद, विवाद और संवाद की प्रक्रिया में हुआ। नामवर सिंह, रामविलास शर्मा को संघर्ष और साधना के अप्रतिम आलोचक तथा प्रगतिशील आलोचना के अग्रदूत के रूप में मानते थे।
दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया के सहायक आचार्य डॉ. योगेश प्रताप शेखर ने ‘दूसरी परंपरा और हजारी प्रसाद द्विवेदी’ विषय पर कहा कि नामवर सिंह के लिए परंपरा कोई स्थिर या ठहरी हुई वस्तु नहीं है; उसका समकाल से गहरा संबंध है। द्विवेदी जी की तरह ही नामवर जी के यहाँ भी परंपरा इकहरी नहीं है। उनके अनुसार पुराने और नए के बीच के द्वंद्वात्मक संबंधों के माध्यम से परंपरा का विकास होता है। द्विवेदी जी की परंपरा संबंधी विवेचना में नामवर जी ने यही नयी दृष्टि जोड़ी।
‘आधुनिकता, इतिहास और उपन्यास’ विषयक सातवें सत्र में ‘उपन्यास की भारतीयता का प्रश्न और नामवर सिंह’ विषय पर बोलते हुए प्रो. विनोद तिवारी ने कहा कि नामवर सिंह का मानना था कि हिंदी उपन्यास रोमांस के अधिक निकट है। उपन्यास को भारतीय ढंग का मानना एक ऐसा प्रश्न है, जो अभी भी पूरी तरह सुलझा नहीं है। नामवर सिंह अंतर्वस्तु पर विशेष जोर देते हैं। उनके अनुसार उपन्यास केवल मध्यवर्ग का आख्यान नहीं, बल्कि किसान जीवन की महागाथा भी है।
डॉ. राहुल सिंह ने ‘नामवर सिंह का आधुनिकता-बोध’ विषय पर कहा कि नामवर सिंह के यहाँ आधुनिकता अनुप्रयोग के रूप में उपस्थित है। उनके यहाँ आधुनिकता वस्तुस्पर्शिनी प्रतिभा के रूप में प्रकट होती है। ‘नामवर सिंह का इतिहास-बोध’ विषय पर डॉ. वैभव सिंह ने कहा कि नामवर सिंह साहित्य को अपने आप में एक ऐतिहासिक अवधारणा मानते थे। वे तर्कसंगत इतिहास-दृष्टि की खोज और उसके विकास पर बल देते थे। इस सत्र का संचालन डॉ. सत्यप्रकाश सिंह ने किया।
‘हिन्दी का गद्य पर्व’ विषयक आठवें सत्र में श्री राकेश तिवारी ने ‘नामवर सिंह : कथा-आलोचना के प्रतिमान’ विषय पर कहा कि उनके साक्षात्कारों, व्याख्यानों और पुस्तकों में कहानी संबंधी विचारों को देखा जा सकता है। नामवर जी की समीक्षा-पद्धति नए पाठकों की तलाश करती है। उनकी आलोचना पाठकीय संशय को आश्वस्ति में बदल देने की क्षमता रखती है।
‘बनास जन’ के संपादक पल्लव ने ‘नामवर सिंह की आलोचना में प्रेमचंद’ विषय पर कहा कि नामवर जी ‘प्रेमचंद और भारतीय समाज’ में मुखर सैद्धांतिक आग्रहों के बजाय अमुखर दृष्टि अपनाते हैं। वे विश्व साहित्य के संदर्भ में प्रेमचंद की पुनर्व्याख्या करते हैं और उनकी कला की सादगी, सरलता तथा बेबाकपन को रेखांकित करते हैं।
‘हिन्दी साहित्येतिहास पर नामवर-विचार’ विषय पर डॉ. विशाल विक्रम सिंह ने कहा कि 1990 के बाद बदली परिस्थितियों के अनुसार नामवर सिंह इतिहास के पुनर्लेखन की आवश्यकता पर बल देते हैं। उन्होंने प्राच्यवादी काल-विभाजन को तोड़ने का कार्य किया।
इस अवसर पर प्रो. वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी, प्रो. बलिराज पाण्डेय, प्रो. चंद्रकला त्रिपाठी, प्रो. वशिष्ठ द्विवेदी, प्रो. आनंद कुमार, प्रो. मनोज कुमार सिंह, प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल, प्रो. आशीष त्रिपाठी, प्रो. प्रभाकर सिंह, प्रो. नीरज खरे, डॉ. सूर्य नारायण, डॉ. पल्लव, डॉ. किंगसन सिंह पटेल, डॉ. मोतीलाल, डॉ. प्रीति त्रिपाठी, डॉ. सत्यप्रकाश सिंह, शिव कुमार पराग, उज्ज्वल भट्टाचार्य, डॉ. विवेक सिंह, डॉ. सुशील सुमन, डॉ. राहुल सिंह, डॉ. वैभव सिंह आदि सहित बनारस एवं देश के अनेक गणमान्य विद्वान, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।
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शोधार्थी, हिन्दी विभाग
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
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